hamarivani.com

www.hamarivani.com

शुक्रवार, 20 सितंबर 2013

बडा कौन : यू. आर. अनंतमूर्ति ,मोदी या फिर देश ?

          अनंतमूर्ति दादा आपने बयान दिया है कि यदि मोदी प्रधानमंत्री बने तो मैं देश छोडकर चला जाऊँगा.आपके इस कथन पर कुछ भी कहने से पहले मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि बतौर साहित्यकार मेरे हृदय में आपके लिए अपार आदर है.

          मैं यह नहीं समझ पा रहा हूँ कि आपने उपर्युक्त बयान देकर अपना दर्जा बढाया है या फिर मोदी का दर्जा बढाया है. आप पर इस देश की अपेक्षा मोदी का व्यक्तित्व हावी हो गया है अथवा फिर आपका सोचना है कि उन दोनों से ऊपर मैं हूँ. सन 1971 में पाकिस्तान से हुई लडाई और बांगलादेश की आजादी के कुछ दिनों के बाद तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल मानेकशा ने एक बयान दिया था कि आजादी के समय जिन्ना ने मुझे पाकिस्तान आ जाने के लिए कहा था और अगर मैं पाकिस्तान चला गया होता तो इस लडाई में भारत हार गया होता. मानेकशा के इस बयान पर उस समय लोकसभा के उपाध्यक्ष श्री जी जी स्वेल ने मानेकशा को गीता पढने की सलाह दी थी. मैं नहीं समझ पा रहा हूँ कि मैं छोटे मुँह बडी बात कहने की और आपको कुछ सलाह देने की जुर्रत कैसे करूँ. कभी-कभी महिमामंडित व्यक्तित्वों के साथ अहम की समस्या हो जाती है, इतनी अधिक कि वे खुद को देश और समाज से ऊपर समझने लगते हैं .  
   

         इस देश में तमाम लोग हैं जो मोदी के विरोधी हैं. पर समस्या यह है कि यदि इन सभी ने आपके दिखाए हुए रास्ते पर चलने की ठान ली तो दो-तिहाई देश खाली हो जाएगा. कैसे,वह मैं आपको बताता हूँ. इस देश की कुल जनसंख्या के लगभग आधे ही मतदाता हैं यानी कि लगभग साठ करोड (ताजा आँकडों के अनुसार 2014 के लोकसभा चुनाव में 79 करोड मतदाता होने के  आसार हैं). इनमें से आधे से कुछ ही अधिक वोट डालने जाते हैं यानी अधिक से अधिक चालीस करोड. सन इक्यान्नबे के बाद होने वाले चुनावों का अनुभव बताता है कि जो भी पार्टी तीस प्रतिशत से अधिक वोट पा जाती है वह सरकार बनाने में सक्षम हो जाती है. यानी कि बीस करोड के लगभग वोट मिल जाएं तो इन्हें पाने वाला प्रधानमंत्री बन जाएगा. 2009 में आयोजित लोकसभा चुनावों में 11.9 करोड वोट पाकर कांग्रेस सरकार बनाने में सक्षम हो गई थी. इसके बाद दूसरे स्थान पर रही बी जे पी को 7.8 करोड वोट प्राप्त हुए थे. फिर अगर मोदी प्रधानमंत्री बन जाते हैं और उसके बाद अस्सी करोड से भी अधिक लोग आपकी तरह देश खाली करने लगे तो सवाल उठता है कि ये सब जाएंगे कहाँ, और कौन सा देश अपनी मिट्टी पलीद करवाने के लिए इन्हें जगह देगा. आपकी बात दूसरी है. आप नामी-गिरामी साहित्यकार हैं, आपको तो किसी भी देश में जगह मिल जाएगी.


          पर ऐसा कर आप साहित्यकार के कर्तव्य से मुँह मोडेंगे. किसी भी साहित्यकार का सबसे बडा अस्त्र उसकी कलम होती है. यह कलम जनमत का निर्माण करने में महती भूमिका का निर्वाह करती है.ऐसी क्या बात हो गई कि आपने साहित्यकार के सबल शस्त्र का उपयोग करने के स्थान पर पहले ही मैदान छोड दिया और देश ही छोडने का ऐलान कर दिया. फिर से छोटे मुँह बडी बात करने का दुस्साहस कर रहा हूँ- क्यों नहीं आप आप अपने मतवैभिन्य या विरोध को रचनात्मक आकार देते जो शायद जनता को या फिर मोदी को ही आपके अनुसार बदल जाने के लिए मजबूर कर दे.

          आपने कहा है कि मोदी दबंग नेता हैं और दबंग व्यक्ति कायरों की जमात खडी करता है. पर यहाँ आप भारतीय जनता को गलत आँक रहे हैं (क्षमा करें , एक बार छोटे मुँह बडी बात हुई जा रही है). दबंग इंदिरा गाँधी को इसी जनता ने जिसे आपके अनुसार कायर सिद्ध होना चाहिए था, सन सतहत्तर में सत्ता से बेदखल कर दिया था.

          आपसे मेरी अपील है कि आप मोदी से अपने विरोध को अमली जामा इसी देश में कलम का उपयोग कर पहनाएं, देश छोडने की बात कर तो आप उसी कायर जमात में खडे हो जाएंगे जिसकी सृष्टि आपके अनुसार दबंग करते हैं. दूसरे महानता ने कितने भी ऊँचे शिखर का स्पर्श क्यों न कर लिया हो, वह इतनी ऊँची कभी नहीं हो जाती कि उसके सामने देश क्षुद्र दिखने लगे. 

          जो भी गुस्ताखी हुई हो छोटा भाई समझ कर माफ कीजिएगा, छोटे मुँह बडी बातें करते-करते थक गया हूँ. दादा,आशा करता हूँ कि आप मेरी बातों पर गौर फरमाएंगे.   

मंगलवार, 17 सितंबर 2013

अमेरिका में नस्लवादी भावनाएं!

           चौबीस वर्षीय भारतीय मूल की अमेरिका में ही जन्मी, नीना दावुलुरी जो भविष्य में कार्डियोलॉजिस्ट बनने का इरादा रखती हैं और डॉक्टर दम्पति की संतान हैं; मिस अमेरिका चुनी गई हैं. किसी भी लोकतंत्र में किसी भी नागरिक को वहाँ आयोजित होने वाली सभी गतिविधियों में जिनके लिए वह पात्रता पूरी करता है  भाग लेने का पूरा हक होता है, और इसे  ध्यान में रखते हुए नीना का मिस अमेरिका प्रतियोगिता में भाग लेना  और सफल होना कोई आश्चर्य का विषय नहीं है. पर आश्चर्य का विषय वे टिप्पणियाँ हैं जो उनके मिस अमेरिका चुने जाने के बाद अमेरिका में की गईं. इनमें से कुछ निम्नवत हैं-

        "अरब ने जीती मिस अमेरिका प्रतियोगिता"

        "उम्म.....क्या हम 9/11  भूल गए हैं"

        "मिस अल-कायदा"

        "मिस टेररिस्ट"

        "कैसे..... एक विदेशी ने मिस अमेरिका प्रतियोगिता जीत ली.वह एक अरब है"

       "मिस अमेरिका ? क्या  आपका मतलब 7-11 से है."(उक्त टिप्पणी भारतीय मूल के लोगों द्वारा चलाए             जा रहे स्टोरों के संदर्भ में है.) 

       " मुस्लिम"

          मैं अमेरिकियों द्वारा  इसी प्रकार की नस्ली टिप्पणियाँ उनके अपने राष्ट्रपति ओबामा के बारे में  भी पहले देख चुका हूँ. यह टिप्पणियाँ इस तथ्य को बयान करती हैं कि वह माइंडसेट  जिसने दो-से तीन शताब्दी पहले तमाम एफ्रो-अमेरिकन लोगों को गुलाम बनाया था और जिससे एक लंबे संघर्ष के बाद अमेरिकी जनता को मुक्ति मिली और जिसके खात्मे के लिए अब्राहम लिंकन तथा मार्टिन लूथर किंग को शहादत देनी पडी आज भी अमेरिका में साँसें ले  रहा है. जिस तरह भारतीय लोकतंत्र को हर प्रकार के भेदभाव से मुक्त वास्तविक लोकतांत्रिक मूल्यों को स्थापित करने के लिए लंबा संघर्ष करना है वैसे ही अमेरिकी लोकतंत्र को भी नस्ली माइंडसेट को खत्म करने के लिए अभी भी बहुत कुछ करना है.

          पर इन  सबसे आगे बढकर जो बात आश्चर्यचकित करने वाली है वह अमेरिकियों की सामाजिक विज्ञान ,इतिहास और भूगोल के प्रति अज्ञानता.शायद ज्ञान के इसी गिर रहे स्तर के कारण उन्हे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भारतीय और चीनी प्रतिभाओं को अपने देश में आयात करने की जरूरत पड रही है.

रविवार, 15 सितंबर 2013

कुछ सवाल मोदी से

      बी जे पी द्वारा नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने के साथ ही मुख्य विपक्षी दल में चल रही उठापटक का दौर समाप्त हो गया है. इस प्रकार सरकार बनने की स्थिति में नेतृत्व के पहले दावेदार का नाम स्पष्ट हो गया है. साथ ही यह भी स्पष्ट हो गया है कि पार्टी पर आर एस एस का प्रभाव अटल-आडवाणी युग की तुलना में बढ गया है और इसे प्रभावी चुनौती मिलने तक यह बना रहेगा . आर एस एस को यह प्रभावी चुनौती पार्टी में मोदी के अलावा अन्य कोई देने की स्थिति में नहीं है. मोदी की अपनी मनमर्जी से कार्य करने की जो शैली है उसके कारण यह स्थिति भविष्य में पैदा हो सकती है. यह निर्भर इस बात पर करेगा कि मोदी पार्टी पर अपनी पकड कितनी मजबूत कर पाते हैं और उनके खुद के जो स्पष्ट समर्थक नहीं हैं उन्हें कितना निष्प्रभावी कर पाते हैं या फिर उन्हें अपना स्पष्ट समर्थक बना लेने में कितना समर्थ हो पाते हैं. मोदी का नाम एक अर्से से बहुचर्चित होने  और उनके द्वारा अनेक मंचों पर अपने विचार रखने के बाद भी अभी तक उन्होने मुख्यत: आर्थिक मुद्दों पर ही बात की है और इन पर उनके विचार जगजाहिर हैं पर राष्ट्रीय स्तर पर बहुत से महत्वपूर्ण मामलों में उन्हें लोगों के सामने अपनी नीति और विचार स्पष्ट करने हैं. यह निम्नवत हैं-

  • ·         देश की विदेश नीति क्या होगी,खास तौर पर इस बात को देखते हुए कि अमेरिकापरस्त पार्टी माने जाने के बावजूद पिछले कुछ समय से बी जे पी ने अनेक मुद्दों पर जिनमें आर्थिक पहलू भी शामिल है, ऐसा रवैया अपनाया है जो पश्चिमी हितों से अलग हैं और जिन पर कहीं-कहीं वे और साम्यवादी साथ-साथ खडे पाए गए हैं जैसे कि रिटेल सेक्टर में विदेशी निवेश के प्रश्न पर. दूसरे अमेरिका लंबे समय से मोदी को वीजा न देने पर अडा हुआ है. मोदी ने व्यापार और उद्योग के क्षेत्र में अपने राज्य में  चीन और जापान के साथ संबंधों को तरजीह दी है.क्या ऐसा ही केंद्र में भी होगा ?

  • ·         देश की रक्षा नीति क्या होगी विशेषकर इस बात को देखते हुए कि सेनाओं के पास उन्नत किस्म के साजो-सामान  का अभाव है और कई नए तथा महत्वपूर्ण प्रस्ताव दलाली के फेर में फँस गए हैं. कई सरकारी संस्थानों के कार्यनिष्पादन तथा उसकी गति को देखते हुए भारतीय रक्षा उत्पादन क्षेत्र को गैल्वनाइज करने के लिए क्या किया  जाएगा.यहाँ प्राइवेट सेक्टर की भूमिका क्या होगी ?

  • ·         जो सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है वह यह कि मोदी को मुसलमानों के लिए हौवा बना कर खडा किया जा रहा है और उनके भय को दूर करने तथा उन्हें आश्वस्त करने के लिए वे क्या करेंगे ? यहाँ सिर्फ यह कह देने से काम नहीं चलेगा कि गुजरात में बारह साल से दंगे नहीं हुए हैं और गुजरात में मुसलमान शिक्षा तथा नौकरी की दृष्टि से अच्छी स्थिति में हैं. अब तक इस बारे में मोदी से जब भी सवाल किया गया है ,उन्होने सीधे-सीधे इसका उत्तर देने के बजाय घुमा-फिरा कर जवाब दिया है. वे सीधे-सीधे संवाद कर इस प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं  ताकि लोग आश्वस्ति की स्थिति अनुभव कर सकें. मुसलमान इस देश की आबादी का पाँचवाँ हिस्सा हैं तथा  आप उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकते. एक विद्द्वान के अनुसार भारतवर्ष में धर्म से ज्यादा महत्वपूर्ण जाति  आधारित समुदाय हैं और जातीय जनसंख्या के आधार पर  सुन्नी मुस्लिम इस देश का सबसे बडा जनसमूह हैं. इसलिए उन्हें अल्पसंख्यक कहना उनके साथ नाइंसाफी है और देश की तरक्की में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है.

शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

लाशों पे खडा कौन?

          बकौल किसी शायर के-
                                           तारीख की सफहों पे जो इंसान बडे हैं
                                           उनमें कितने ही हैं जो लाशों पे  खडे हैं

         तो साहब लाशों पर राजनीति का सिलसिला पुराना है  और मुजफ्फरनगर के दंगों के साथ ही यह सिलसिला शुरू हो गया है या यूँ कहें कि दंगों  का सिलसिला जो कुछ समय से बंद था फिर से शुरू हो गया है  और उसी के साथ शुरू हो गई है लाशों पर राजनीति.

         किसी एक और शायर ने कहा है-
                                                     एवज नींद के आँखों में अश्क आ जाएं साहब
                                                    ऐसा भी किसी शब सुनो अफसाना किसी का

         और मुझे यकीन है कि कोई भी इंसान जिसके सीने में दिल  जैसी कोई चीज है, अगर मुजफ्फरनगर के दंगों  में जो निर्ममता दिखाई गई है उसका हाल सुनेगा या पढेगा तो पसीजे बिना नहीं रह सकता. बेगुनाह बच्चों पर हमले किए गए ,उनके सामने ही उनके अपनों को कत्ल कर दिया गया,घरों को जला दिया गया, और तो और ,उस घर को भी नहीं छोडा गया जहाँ कोई दुलहन हाथों में मेंहदी सजाए अपने होने वाले दूल्हे की आने वाली बारात का इंतजार कर  रही थी.तमाम लोग अपने घरों को छोड कर भाग गए हैं,परिवार के लोग एक  दूसरे से जुदा हो गए  हैं.इस दंगे का  हाल सुन कर आजादी के ठीक  पहले होने वाले दंगों का स्मरण हो आता है.उस समय तो देश का बँटवारा हुआ था, सवाल उठता है कि अब  क्या होने वाला है.

         यह बात बेमानी है कि दंगों में जो मारा गया,जिसका घर जला ,जिसका अपना बिछुड गया वह हिंदू था या मुसलमान.उससे भी पहले वह एक इंसान और हिंदुस्तानी था,वह हिंदुस्तानी जिसके जान-माल की हिफाजत का वायदा कर हमारी प्रदेश और देश की सरकारें सत्तासीन हुई हैं निश्चय ही प्रदेश सरकार जिस पर कानून व्यवस्था की सीधी जिम्मेदारी थी इस कार्य में अक्षम साबित हुई है. 

         गत वर्ष फैजाबाद में दुर्गापूजा पर दंगे हुए थे,वह शहर जिसकी अमन की परंपरा पर वहाँ के बाशिंदे गर्व करते हैं और जहाँ दशहरे के मौके पर चौक की मस्जिद में बैठकर बचपन में मैंने तीन दिनों तक निकलने वाली झाँकियाँ देखी हैं और कभी किसी ने मुझे या अन्य किसी को कभी यह नहीं कहा कि तुम हिंदू होकर इस मस्जिद में कैसे आए.मुझे बाद में यह जानकर दुख हुआ कि उस मस्जिद में तोड-फोड  की गई.मेरे एक मित्र ने बताया कि कोई प्रोवोकेशन न होते हुए भी ऐसा हुआ और पुलिस मूक दर्शक बनी रही.जब मैंने अपने मित्र से कहा कि समाजवादी पार्टी की सरकार होते हुए भी ऐसा कैसे हुआ तो उसने कहा कि इसके पीछे वही  हैं जिन्हें जनता के ध्रुवीकरण से लाभ होने की उम्मीद है.

         जो दंगों का शिकार हुए हैं उनके दिलो-दिमाग पर  शायद लंबे समय तक दाग रहेगा.उनकी नजर  में भी दंगाई ,दंगाई न होकर हिंदू या  मुसलमान है.जो दंगों से महफूज बच गए हैं  उनका भी यही खयाल है कि नुकसान इंसानों का न होकर हिंदू का हुआ है या फिर मुसलमान  का हुआ है.नफरत के यह बीज जो अंकुरित हो गए हैं उन्हे देखकर कुछ लोग वैसे ही प्रसन्न हो रहे हैं जैसे किसान को अपने खेत में कोपलें फूटते देखकर होता है.वे खाद -पानी देकर जल्दी ही इसे हरा-भरा वृक्ष बना देने की लालसा पाल रहे हैं.

         लाशों पर खडे लोगों की बाछें खिली हुई हैं.  कुछ दलों को उम्मीद है कि मुसलमान अब समाजवादी पार्टी का दामन  छोडकर उसके खेमे में आ जाएंगे  तो कुछ को उम्मीद है कि हिंदुओं के  वोट अब जात-पाँत को भूलकर थोकबंद  उनकी झोली में आ गिरेंगे.समाजवादी  इसी सोच में हैं कि दाँव उल्टा कैसे पड गया.

          यह दंगे हमारे सामने सवाल खडा करते हैं कि क्या एक लडकी के साथ छेडखानी के लिए और फिर दो लडकों की मौत के लिए  पूरे के पूरे समुदाय  जिम्मेदार हैं और यदि ऐसा है तो इसके लिए हिंदू कौम नहीं या मुसलमान कौम नहीं बल्कि पूरी की पूरी हिंदुस्तानी कौम जिम्मेदार है.

चलते-चलते

          देश में राजीव गाँधी से लेकर अब तक जितनी भी बाबा लोग सरकारें बनी हैं उनके काम-काज को देखते हुए लगता है  कि  लोगों को बाबा लोगों से उम्मीद रखना छोड देना  चाहिए चाहे वे उमर फार्रूक हों या फिर अखिलेश यादव.

गुरुवार, 15 अगस्त 2013

मंत्रियों के मानकीकरण के लिए हो परीक्षा!



          पिछले दो से तीन दशकों के बीच भारतीय राजनीति और राजनीतिज्ञों के स्तर में धीरे-धीरे गिरावट आई है.इसका प्रमुख कारण अपराधी तत्वों और कबीलाई मानसिकता वाले तत्वों का राजनीति के साथ जुडना रहा है.राजनीतिक पार्टियों ने इस आधार पर कि ऐसे तत्व संसद और विधानमंडलों के लिए सीटें जीतने में सहायता कर सकते  हैं; पहले तो इनसे चुनावों को जीतने में मदद ली और फिर गठबंधन सरकारों के दौर के साथ राजनीति के मैदान में ज्यादा  खिलाडी आ जाने,जाति और धर्म का चुनावों पर असर बढ जाने और प्रतिद्वंदिता तगडी हो जाने पर इन्हे सीधे-सीधे उम्मीदवार के तौर पर चुनावों में उतारना ही शुरू कर दिया. नैतिक पृष्ठभूमि गौण होती गई है और इनमें से कई चुनाव  जीतने के बाद अपने प्रभावक्षेत्र के कारण या फिर जोड-तोड की राजनीति के चलते मंत्री  बनने में भी सफल  रहे हैं.प्रशासन तो दूर  की बात है,सामान्य शिष्टाचार का भी पालन न करते हुए अनर्गल प्रलाप करने और अनाप-शनाप बकने में भी इन्हें कोई परहेज नहीं है.पिछले  दिनों  इसकी कुछ बानगियाँ देखने में आई हैं जो नीचे दी गई हैं.

  •  उत्तर प्रदेश के एक मंत्री श्री अहमद हसन ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की  उपस्थिति में  निलम्बित  आई.ए.एस. दुर्गाशक्ति नागपाल  की पारिवारिक पृष्ठभूमि पर प्रश्नचिह्न खडे किए और  कहा कि यदि वे उसके बारे में  बता देंगे तो दुर्गाशक्ति को समर्थन देने वाले लोगों को अपने  इस समर्थन पर  पश्चाताप होगा.(तथ्य यह है  कि दुर्गाशक्ति के पिता डिफेंस इस्टेट सेवा में अधिकारी थे और अपने कार्यों के लिए प्रेसीडेंट मेडल से सम्मानित हो चुके हैं और  उनके पितामह पुलिस अधिकारी थे जिन्होने अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हुए प्राण गंवाए थे. )
  • बिहार सरकार के एक मंत्री भीम सिंह ने कहा कि जो लोग सेना और पुलिस में जाते हैं,शहीद हो जाना  उनका पेशागत काम है.यह कोई बडी बात नहीं है और इसके लिए उनके दरवाजे जाया जाए यह जरूरी  नहीं है.  .
  • कर्नाटक के मांड्या लोकसभा उपचुनाव में कांग्रेस की उम्मीदवार राम्या के बारे में जनता दल एस नेता एम श्रीनिवास ने जो  दो बार एम.एल.ए. रह चुके हैं कहा कि वे टेस्ट  ट्यूब बेबी हैं,उनके पिता, जाति और मूलनिवास का पता नहीं है. उन्होने ऐसा कहते हुए इस बात की परवाह नहीं की कि राम्या के पालक पिता आर टी नारायन अभी कुछ दिन पहले ही दिवंगत हुए हैं और राम्या को अभी उससे उबरने का भी अवसर नहीं मिला है.   
         एक ओर तो हम भारतीय सिविल सर्विसेज जैसी  प्रतियोगिता का आयोजन कर अपने प्रशासनिक अधिकारियों को चुनते हैं  और दूसरी ओर उनकी देख- रेख करने के लिए ऊपर वर्णित नेताओं को चुनते हैं.इससे पूरी व्यवस्था का विकृत होना स्वाभाविक है.

          इसलिए  क्या यह उचित नहीं होगा कि हम दो व्यवस्थाएं करें-

1.प्रथम तो मंत्रियों का मानकीकरण करने  के लिए एक परीक्षा का आयोजन हो.इस परीक्षा के आयोजन के लिए एक समिति बनाई जाए जिसके अध्यक्ष राष्ट्रपति हों और प्रधानमंत्री,नेता विपक्षी दल ,लोकसभा अध्यक्ष ,राज्यसभा के सभापति तथा सभी राष्ट्रीय स्तर के मान्यताप्राप्त दलों के एक-एक प्रतिनिधि इसके सदस्य हों.इस समिति की एक परीक्षा आयोजन उपसमिति हो  जिसके अध्यक्ष सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और सचिव यू.पी.एस.सी. के अध्यक्ष हों जो पारस्परिक सहमति से और मुख्य समिति के अनुमोदन से विभिन्न क्षेत्रों के ख्यातिलब्ध विद्वानों को पाठ्यक्रम तैयार करने तथा  परीक्षा की व्यवस्थाएं करने  के लिए नियुक्त करें.इसके तत्वावधान में प्रत्येक वर्ष मंत्री मानक परीक्षा  का आयोजन हो और जो भी एम.पी.,एम.एल.ए  मंत्री बनना चाहते हैं वे इस परीक्षा में बैठें और उसे उत्तीर्ण करें.परीक्षा उत्तीर्ण करने वालों को ही मंत्री बनाया जाए .यदि प्रधानमंत्री या कोई मुख्यमंत्री इनसे बाहर जाकर किसी का चयन मंत्री के रूप  में करना चाहते हैं तो उसके लिए राष्ट्रपति से (राज्यों के मामले में गवर्नर के माध्यम से)  विशेष अनुमति प्राप्त करें.

नोट-चूँकि मुझे विश्वास है कि राजनीतिक दल  इस प्रस्ताव से सहमत नहीं होंगे अत: कोई  आई.एस.ओ. जैसी संस्था निजी पहल कर बनाई जा सकती है  जो  इस प्रकार की परीक्षा का आयोजन करे और राजनीतिक दलों से अपने प्रतिनिधियों को परीक्षा में बैठने के लिए भेजने का आग्रह करे.जो भी राजनीतिज्ञ परीक्षा उत्तीर्ण करते हैं उन्हें यह संस्था आई.एस.ओ. कि तरह प्रमाणपत्र  देकर मानकीकृत करे.अभी यह विचार किसी को अव्यवहारिक या हास्यापद लग सकता है,पर कार्यान्वित करने का प्रयास करने पर वैसे ही चल निकलेगा जैसे आई.एस.ओ. के प्रमाणन के लिए व्यवसायी संस्थाएं उत्सुक रहा करती हैं.

2.राजनीतिक नेताओं और एम.पी. तथा एम.एल.ए. के लिए विशेष प्रशिक्षण शिविरों का  आयोजन किया जाए जहाँ उन्हें सामान्य राजनीतिशास्त्र,प्रशासन और अर्थशास्त्र के अलावा सामान्य तथा राजनीतिक शिष्टाचार का प्रशिक्षण दिया जाए.

नोट-वैसे तो कुछ राजनीतिक दलों द्वारा प्रशिक्षण शिविरों का आयोजन किया जाता है पर इन्हें और उद्देश्यपरक बनाए जाने, इनमें शिष्ट राजनीतिक व्यवहार का आवश्यक तौर पर प्रशिक्षण दिए जाने, आयोजन नियमित रूप से किए जाने और सक्रिय कार्यकर्ताओं को इनमें अनिवार्यत: प्रशिक्षित किए जाने   की जरूरत है.

         

सोमवार, 12 अगस्त 2013

टोपी पहनना और पहनाना कितना जरूरी?

          जब से शिवराज सिंह चौहान की नमाजी  टोपी पहने हुए और रजा मुराद से गले मिलते हुए फोटो अखबारों में छपी है,तरह- तरह  के कयास लगाए जा रहे हैं.हैं.कुछ लोगों का ख्याल बना कि यह शिवराज सिंह ने मोदी के मुकाबले खुद की उदार और सेक्यूलर छवि पेश करने के लिए किया जिन्होने सदभावना उपवास के दौरान एक मुस्लिम धर्मगुरु द्वारा  नमाजी टोपी पहनाए जाने का प्रयास करने पर इससे इंकार कर दिया था .रजा मुराद ने यहाँ तक कह डाला कि जिन मुख्यमंत्रियों को टोपी पहनने से इतराज है उन्हें शिवराज सिंह से सीख लेनी चाहिए. कुछ को ख्याल आया कि जैसे बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद आडवाणी की स्वीकार्यता का अभाव देखकर आर एस एस -बी जे पी  को अटलजी का नाम प्रधानमंत्री के रूप में आगे बढाना पडा वैसा ही कुछ मोदी और शिवराज सिंह के मामले में हो सकता है.आडवानी पहले ही शिवराज सिंह की तुलना अटलबिहारी से कर चुके हैं.

          पर इन सबसे  परे एक सवाल यह उठता है कि क्या मात्र नमाजी टोपी पहनने से कोई व्यक्ति उदार या सेक्यूलर हो जाता है और उसका  किया- धरा सब कुछ स्याह से सफेद हो जाता है . यदि ऐसा है तो आडवानी  की   मंदिर-मस्जिद संबंधी भूमिका पर  किसी  को ऐतराज नहीं होना चाहिए और उन्हे सेक्यूलर मानना चाहिए क्योंकि इफ्तार पार्टियों  में नमाजी टोपी लगाए हुए उनकी फोटो काफी पहले अखबारों में छप चुकी है. पंडित नेहरू नमाजी टोपी  पहनने की  कसौटी पर खरे न उतरने के कारण(उन्होने यह  टोपी कभी  नहीं पहनी) सेक्यूलर होने के इस मापदंड को पूरा नहीं करते ,जबकि उनकी धर्मनिरपेक्षता पर कोई भी प्रश्नचिह्न नहीं लगा सकता. जिन  समुदायों के वोट अधिक नहीं हैं या फिर जो समुदाय टैक्टिकल वोटिंग नहीं करते यथा पारसी  अथवा यहूदी ,उनके द्वारा धार्मिक प्रयोजनों या अन्य अवसरों पर पहनी जाने वाली   टोपी  पहन कर  यह नेतागण फोटो क्यों नहीं खिंचवाते.  जिन्होने मैकियावेली को पढा है उन्हे मालूम होगा कि मैकियावेली का कहना है  कि खास समुदाय का समर्थन पाने के के लिए उनके पूजा स्थलों पर जाकर श्रद्धा भाव प्रकट करना चाहिए और उनके जैसी ही  वेश-भूषा पहननी चाहिए.तो हमारे अधिकांश राजनीतिज्ञ जो टोपी लगा कर फोटो खिंचवाते हैं, इसी मैकियावेलियन प्रयास में लगे हुए हैं और ऐसा कर जनता को ही टोपी पहनाने में लगे हुए हैं .  अपने इसी तरह के एक प्रयास के तहत जिन्ना की मजार पर जाकर खिराज-ए-अकीदत  पेश करते हुए आडवानी ने उन्हे सेक्यूलर होने का प्रमाणपत्र देकर अपना पूरा राजनीतिक कैरियर चौपट कर लिया. ऐसे राजनीतिज्ञों से मोदी कम  से कम इस मायने में सच्चे हैं कि वे अपनी असलियत को छिपाने का प्रयास नहीं करते.

          बहुत पहले मेरा एक मित्र मुझे गुरुद्वारे ले गया.तब मैं पहली बार गुरूद्वारे गया था.उस मित्र के कहने पर मैंने अपना सर  रूमाल से ढंक लिया था.गुरुद्वारे में सर ढंकना  आवश्यक है ऐसा उसने मुझे बताया था .मैं ऐसे कुछ मुस्लिमजन को भी जानता हूँ जिन्होने हिंदू मित्रों के  साथ  किसी  पूजा में शामिल होने पर या मंदिर में जाने पर तिलक भी लगवाया और प्रसाद ग्रहण किया.पर इस सबके पीछे मित्र के समुदाय का आदर करने की भावना थी.इसके पीछे वोट पाने  जैसा कोई लालच नहीं था .इसलिए वोट पाने की मंशा से पहनी गई टोपी के पीछे छिपे असली भाव को जनता को समझना चाहिए और ऐसा  करने वालों के वास्तविक कृतित्व के आधार पर ही उनके विषय  में कोई धारणा बनानी चाहिए.

बुधवार, 7 अगस्त 2013

पाँच और शहीदों के ताबूत (कविता)

पाँच और शहीदों के ताबूत

वो आ रहे हैं पाँच ताबूत सैनिकों की शहादत याद दिलाने
वतनपरस्ती,खुद्दारी,बहादुरी और जाँबाजी की कहानी बताने   
विस्मृत होती जा रही  थी छवि सर कटाने वाले हेमराज की 
फिर  से  सामने  आए देश  की  आन  पर  सर दे देने वाले.

शरीफ साहब की बार-बार दोस्ती की पुकार है
कितनी असली या नकली, यह उनके दिल का राज है
खुदा जाने पाक और फौज में कितना उनका इकबाल है
जब भी सत्ता में आते हैं,कुछ न कुछ घट  जाता  है
चाहे कारगिल,बटालिक,द्रास हो या सेक्टर  पुंछ  हो
चाहे हों अटल बिहारी या फिर मनमोहन सिंह हों
दोस्ती का हौसला पस्त हो जाता है,
मित्रता का इरादा अस्त हो जाता है.

राहुल बेहाल हैं,सोनिया अवाक हैं
प्रधानमंत्री के रूप में सामने  ढाल है
दोनों ने कहा मामले को पाक के साथ
उच्च स्तर पर उठाने की दरकार है
सोनिया ने कहा भडकाऊ कार्रवाई - हम अदम्य हैं
सैनिकों की प्रवंचनापूर्ण, बर्बर हत्या अक्षम्य है
पर उनके द्वारा नियुक्त प्रधानमंत्री मौन हैं
नक्कारखाने में तूती की आवाज सुनता भी कौन है
हो अमन-चैन और पाक के साथ दोस्ती यह उनका सपना है
दोस्ती के अभियान में खलल पडा यही दुख उनका अपना है

हत्यारे थे आतंकी और साथ थे पाक सैनिकों से दिखते वर्दीधारी
यह कर रहे हमारे रक्षामंत्री श्रीमान ए के एंटोनी हैं
पर इसके पीछे पाक  सेना की कारस्तानी है
यह कहने में जैसे जुबान मौन साध जाती है
पाक से दोस्ती का खयाल दिल में रहता इतना है
उसकी बात पर कोई असर न पडे यही चिंता है
कितने नागरिक आतंक का शिकार हुए यह कोई न गिनता है
कितने सैनिक खेत रहे यह कोई नहीं देखता है.

पाक चिकने घडे सा जिस पर नहीं कोई प्रभाव है
सामान्य शालीनता का भी दुष्ट में अभाव है
फायरिंग कोई हुई नहीं कह, रहा वो धिक्कार है
हमारे शहीदों का इस तरह कर रहा अपमान है
झूठा और मनगढंत आरोप बता रहा वो ललकार है
उनकी शहादत को बार-बार रहा नकार है.

इस देश में एक जवान की जान सस्ती है
एक आई.ए.एस.अधिकारी की आन सस्ती है
गरीब की परिभाषा रोज बदल सकती है
इस देश में सिर्फ नेताओं की मस्ती है
नेताओं को छोड यहाँ और कौन बेशकीमती है
जिन्हे बचाने के लिए सुरक्षा गारद साथ घूमती है
भेडिए भी साधुवेष धारण कर पहन लेते हैं खादी
इन दिनों उन्हें भी सुरक्षा मुहैया होती है.

वह देखो आ गए हैं पाँच और शहीदों के ताबूत
हाहाकार करो, दाँत कसमसाओ और पिओ खून के घूँट
चुने स्थान और समय पर बदले  का  वादा हम  गए  थे  भूल
शत्रु ने मौका देख हमारे सीने में फिर से उतार दिया शूल
                                                                    -संजय त्रिपाठी