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सोमवार, 19 अक्टूबर 2015

पुरस्कार वापसी का लाइव परफारमेंस!

          मुनव्वर राणा साहब ने पुरस्कार वापसी का क्रम शुरू होने के बाद अपने घोषणा की थी कि वे पुरस्कार वापस नहीं करेंगे । फिर तीन-चार दिन में ऐसा क्या घट गया कि उन्हें इसका लाइव परफारमेंस देना पड़ गया। मुनव्वर साहब ने कहा कि उन्हें डर है कि कोई रात में घर में घुस कर उन्हें मार डालेगा और उन्हें कोई बचाने वाला नहीं हैं। वे यह किसके लिए कह रहे थे। कौन लोग हैं यह।
          फिर जो डर जाए वह साहित्यकार कैसा? सोलझेनित्सिन ने साइबेरियाई गुलाग में डाले जाने की कोई परवाह नहीं की और बेहतरीन साहित्य सृजित किया। फिर आपको किसने रोका है? साहित्यकारों के द्वारा सरकार की आलोचना किया जाना, पुरस्कार वापस किया जाना देश में लोकतंत्र की बहाली की गवाही देता है । 
          पर बात यह कही जा रही है कि देश में फासीवाद आ गया है। अगर ऐसा है तो जनता को जगाने से और फासीवाद के विरुद्ध आंदोलन खड़ा करने से आपको किसने रोका है? राजनीतिज्ञों के लिए अपना हित पहले है, वे वही बात करेंगे भले ही किसी भी पार्टी के हों। पर आप साहित्यकार हैं,उनकी बात से व्यथित हुए बिना, अपनी लेखनी को विराम दिए बिना,तूफानों में भी दिया जलाए रखकर विरोध कीजिए, बिना किसी राजनीति का हिस्सा बने । जब आप राजनीति का हिस्सा बनते हैं तो विरोध बेमानी हो जाता है। 
          आज मुनव्वर राना साहब को जब साहित्य अकादमी द्वारा दिये गये स्मृति चिह्न को टी वी के ए बी पी चैनल वालों के समक्ष वापस रखते देखा जिसमें रुपहले अक्षरों में साहित्य लिखा हुआ था तो लगा कि जैसे कोई साहित्य पर तमाचा मार रहा है। साहित्य अकादमी में मात्र पाँच सदस्य सरकार द्वारा मनोनीत होते हैं । शेष 90 से भी अधिक सदस्य साहित्यकारों के अपने होते हैं। फिर भी यदि वे साहित्य अकादमी से मनोवांछित परिणाम हासिल नहीं कर सकते हैं तो इन साहित्यकारों का खुदा ही मालिक है।
           यहाँ मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि कोई मुझे दक्षिणपंथी विचारधारा का न समझ ले । मैं समाजवादी विचारों का पक्षधर हूँ ( इन दिनों प्रचलन में आ गए परिवारवादी समाजवाद का नहीं) और यह बात पूरे विश्वास के साथ कहता हूँ कि भारतवर्ष के सामने तरक्की के रास्ते पर चलने के लिए बहुधर्मी एकता और सद्भाव के सिवा कोई रास्ता नहीं है और इसे सुनिश्चित करने में देश के सबसे बड़े दो धार्मिक समूहों हिन्दू और मुस्लिम दोनों की जिम्मेदारी अन्य मतावलंबियों से कहीं अधिक है। पर दोनों ही समुदायों में ऐसे लोग हैं जो सामाजिक सद्भाव को नुकसान पहुँचाने पर आमादा हैं। जरूरत इस बात की है कि जहाँ भी आग लगाई जाती है उसे हवा देने के बजाय बुझाने का प्रयास किया जाए। पर आग लगाने और हवा देने वाले ही ज्यादा दिखाई दे रहे हैं, बुझाने वाले नहीं । आज फार्रूख अब्दुल्ला साहब ने तो लोगों को अब्दुल रशीद के मुँह पर कालिख पोते जाने के संदर्भ में देश के टुकड़े देखने की चेतावनी दे डाली है। पर उनके द्वारा गोमांस पार्टी दिए जाने वे कुछ नहीं बोले थे। रशीद साहब कालिख पुता चेहरा दिखाकर कह रहे हैं कि दुनिया देख ले कि भारत काश्मीरियों के साथ कैसा व्यवहार करता हैं। सवाल यह है कि कुछ गुंडे - मवाली लोगों के व्यवहार को क्या पूरे भारत के व्यवहार की संज्ञा दी जा सकती है? यह व्यक्ति गोमांस पार्टी आयोजित करने के बाद अब गाँधीजी का नाम उद्धृत कर रहा है।
          कई वर्ष पूर्व एक मुख्यमंत्री के शासनकाल में मुस्लिम गाँवों में कत्लेआम हुआ। कुछ वर्षों पहले उस मुख्यमंत्री के परिवार के एक सदस्य ने मेरी उपस्थिति में कहा - बाबूजी ने कहा कि सालों को काट कर फेंक दो । मैं यह सुन कर अवाक रह गया। वह मुख्यमंत्री एक तथाकथित धर्मनिरपेक्ष पार्टी के थे । मेरे कई साम्यवादी मित्र हैं और इनमें से कई हैं जिन्हें थोड़ा सा उकसाइए तो एक धर्म विशेष के खिलाफ उनकी असली भावनाएं सामने आ जाती हैं। कहने के लिए लोग तरह- तरह के वामपंथी साहित्यकार संगठन बनाकर उसके पदाधिकारी और सदस्य बन कर घूमते हैं। पर एक बार ये आपको अपना करीबी समझने लगें फिर देखिए मंच पर दिए जाने वाले अपने भाषणों से अलग हट कर धर्म विशेष और कुछ जातियों के बारे में कैसे विचार व्यक्त करते हैं। 
          पहले जब धर्मनिरपेक्षता विरोधी और धर्मांधतापूर्ण घटनाएँ घट रही थीं तब इन साहित्यकारों का विवेक नहीं जागा। अब जब एक अलग विचारधारा की सरकार है तब साहित्यिक पुरस्कार वापस किए जा रहे हैं। यह इस आशंका को बल देता है कि साहित्यिक पुरस्कार वापस करने के पीछे राजनीतिक कारण हैं। अन्यथा क्या पुरस्कार वापस करने वालों को कलर ब्लाइंडनेस है जो उन्हें पहले घट रही धर्मनिरपेक्षता विरोधी घटनाएँ नहीं दिखाई देती थीं। स्वयं को धर्मनिरपेक्ष कहने वाले राजनीतिज्ञों एवं उसका झंडा उठाने वाले समाज के अन्य वर्गों के गैर जिम्मेदाराना व्यवहार के कारण ही आज भाजपा सत्ता में है। यह दोगलापन है जिसके कारण साहित्यकार अप्रभावी हो रहे हैं। 
          ए बी पी टी वी चैनल वालों ने जब साहित्यकारों के साथ राकेश सिन्हा, संबित पात्रा और अतुल अनजान को बैठा दिया तभी साहित्यकारों को  समझ लेना चाहिए था कि बहस अंततोगत्वा साहित्यिक नहीं बल्कि राजनीतिक होने जा रही है। ए बी पी चैनल वालों को तो एक स्कूप मिल गया जिसे वे एक-दो दिनों तक भुनाते रहेंगे। 

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

चंद सिरफिरे समाज को बाँट नहीं सकते!

          मजहबी नफरत की बुनियाद पर पले लोग अच्छे और बुरे का, स्याह और सफेद का भेद नहीं कर करते। जो इनके प्रभाव में आ जाते हैं वे भी नहीं कर सकते। यह नफरत तनिक सी देर में हवा के एक बहाव से बवंडर और फिर प्रचंड तूफान में परिवर्तित हो जाता है और फिर बिना इस बात की परवाह किए कि कौन सा पेड़ बबूल का है और कौन सा आम का सबको धराशायी करता जाता है। बबूल का पेड़ जहाँ गिरा वहीं लोगों को शिकार बनाकर उन्हें लहूलुहान करता है ,वहीं आम के पेड़ों से गिरे सभी आम नफरत के व्यापारियों की टोकरी में गिरते हैं और यही उनका कैपिटल गेन है जिस पर उन्हें कोई टैक्स नहीं देना होता।
          दादरी के बिसहडा गाँव मे भी यही हुआ। 8 अक्टूबर को देश ने वायुसेना दिवस मनाया । पर इसके चंद दिनों पहले नफरत के तूफान में एक वायुसैनिक के पिता की जान चली गई और वायुसेना दिवस के दिन वह मजहबी तूफान की चपेट में आ गए अपने भाई की शुश्रूषा में लगा हुआ था। मजहबी नफरत के व्यापारी आम की फसल की बोहनी में लगे हुए हैं क्योंकि गाय मुख्य चर्चा में आ गई है। कोई सीना ठोंककर अपने को बीफ ईटर बता रहा है, कोई स्वयं को इस मामले में वशिष्ठ की परंपरा का अनुगामी बता रहा है। कोई कह रहा है कि कई हिन्दू बीफ खाते हैं तो कोई ऋषियों-मुनियों को बीफ खाने वाला बता रहा है तो कोई गौहत्या की बात कहकर ऐसा करने वालों को चेतावनी दे रहा है और सरकार से गौहत्या बंद कराने की माँग कर रहा है। इस स्थिति में सारे मजहबियों- क्या हिन्दू और क्या मुसलमान- की पौ-बारह है। राजनीतिक रोटियों को सेंकने का यही सबसे अच्छा मौका हैं सो सेंकी जा रही हैं।
          यह तो भला हो बिसहडा गाँव वालों का जो उन्हें अक्ल आ गई और उन्होंने दिनांक 11 अक्टूबर के दिन हकीम की दो बेटियों का गाँव में विवाह आयोजित कर सिद्ध कर दिया कि हिन्दू और मुसलमान अब भी साथ-साथ हैं और आगे भी रहेंगे। चंद सिरफिरे लोग समाज को कुछ समय के लिए उकसा सकते हैं पर बाँट नही सकते।

अकादमी पुरस्कार वापस करना कितना प्रासंगिक ?

                                      अकादमी पुरस्कार वापस करना कितना प्रासंगिक ?
          नयनतारा सहगल के पुरस्कार वापस करने के बाद से साहित्य अकादमी पुरस्कारों को वापस करने की होड़ लगी हुई है और अब तक 25 साहित्यकार पुरस्कार वापस कर चुके हैं। कल मैंने अकादमी पुरस्कार वापस करने के संबन्ध में मुनव्वर राणा और असगर वजाहत साहब के विचार पढ़े थे कि वे ऐसा करने वालों की इज्जत करते हुए भी इस उपाय के प्रभावी होने में विश्वास नहीं करते हैं । अकादमी द्वारा पुरस्कृत हिन्दी साहित्यकार मृदुला गर्ग ने बड़ा मौजूँ सवाल उठाया है कि पुरस्कार वापस कर या अकादमी से इस्तीफा देकर साहित्यकारगण क्या अकादमी की स्वायत्ता के लिए खतरा नहीं पैदा कर रहे हैं। उनका कहना है कि सभी राज्यों में फैली हिंसक असहिष्णुता का और इस सबके प्रति केन्द्र और राज्य सरकारों की उपेक्षापूर्ण दृष्टि का वे पुरजोर विरोध करती हैं। जो भी लोग पुरस्कार लौटा रहे हैं या त्यागपत्र दे रहे हैं उनके साथ वे सहानुभूति रखती हैं। उनका कहना है कि स्वनियुक्त नैतिक पहरेदारों द्वारा एकांगी सांस्कृतिक मूल्य व्यवस्था थोपने का विरोध और असहिष्णुता से असहमति लेखन का अंतर्निहित तत्व है।

         परंतु त्यागपत्र देकर और पुरस्कार वापस कर विरोध का जो तरीका अपनाया जा रहा है वह ऐसा दर्शाता है जैसे कि साहित्य अकादमी कोई स्वायत्त संस्था न होकर सरकार की ही एक शाखा है। मृदुला गर्ग का कहना है कि साहित्यकारों द्वारा ऐसा किया जाना सरकार को साहित्य अकादमी में अपने प्रतिनिधियों को नियुक्त करने का अवसर प्रदान कर सकता है। संस्कृति मंत्री कह ही चुके हैं कि अकादमी में विरोध पर उनकी नजर है। नि:संदेह साहित्य अकादमी को कालबुर्जी की हत्या की निंदा करनी चाहिए थी और शोक सभा आयोजित करनी चाहिए थी। केवल साहित्य अकादमी के ही पुरस्कार क्यों लौटाए जा रहे हैं, अन्य सरकारों द्वारा दिए गए अन्य पुरस्कार भी लौटाए जाने चाहिए थे (एक समाचार के अनुसार नृत्यांगना माया राव ने संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार वापस लौटाने की घोषणा की है)।

          मृदुला गर्ग आशंका व्यक्त करती हैं कि सरकार के स्थान पर साहित्यकारों की अपनी विधिवत निर्वाचित स्वायत्त संस्था को प्रहार का केन्द्र बनाकर उसे कमजोर किया जा रहा है। साहित्यकार स्वयं आपस में झगड़ कर सरकार के लिए स्वायत्त संस्था को अधिकृत कर लेने का रास्ता साफ कर रहे हैं।

         मेरा अपना मत है कि जब विभिन्न लेखकों/रचनाकारों को पुरस्कार विभिन्न सरकारों के शासनकाल में प्रदान किए गए हैं तो उन्हें आज वापस करना जब एक अलग विचारधारा वाली सरकार है जिसने यह पुरस्कार नहीं प्रदान किए थे , उनकी वापसी के औचित्य को सिद्ध नहीं करता। इसी आधार पर आज पुरस्कार वापस करने वाले अपनी तुलना रवीन्द्रनाथ टैगोर से नहीं कर सकते हैं। कविगुरु ने ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गई नाइटहुड की उपाधि ब्रिटिश सरकार को ही लौटाई थी। इंद्रजीत हाजरा का कहना है कि इस प्रकार का विरोध अवांछित तौर पर भारत के विधिक अस्तित्व पर सवाल उठाता है और मैं उनसे सहमत हूँ। देश में दक्षिणपंथी तत्वों के अत्युत्साह के कारण कहीं- कहीं अतिरंजित स्थिति देखने में आ रही है उसके बावजूद भारत " बनाना रिपब्लिक" नहीं बन गया है। जहाँ भी अति की स्थिति है उसको नियंत्रित करने हेतु सरकार पर दबाव बनाने के और भी तरीके हैं। परंतु पुरस्कृत साहित्यकार जो रास्ता अपना रहे हैं वह विश्व में भारत को सीरिया,इराक और अफगानिस्तान की श्रेणी में लाकर खड़ा करता है जहाँ फिलहाल आप अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की बात ही नहीं सोच सकते। कम से कम दुनिया को गलत संदेश देने से हमें परहेज करना चाहिए।

          जब इस प्रकार के विरोध प्रदर्शन के पीछे राजनीति होने की बात कही जाती है तो वह निराधार नहीं है। मैलियाना और हाशिमपुरा के नरसंहारों तथा बाबरी मस्जिद के विध्वंस के समय स्थिति कम सांप्रदायिक नहीं थी । तब हमारे पुरस्कृत साहित्यकारों ने यह रास्ता क्यों नहीं अपनाया। सवाल यह भी है कि क्या समस्त पुरस्कार कार्यकर्ताओं द्वारा पुरस्कार लौटा देने के साथ ही विरोध की भी इतिश्री हो जाएगी। त्यागपत्र दे देने और पुरस्कार लौटा देने का निर्णय मुझे "पैसिव" विरोध का लगता है जो सक्रिय या पुख्ता विरोध का तरीका नहीं है और ड्राइंगरूम में बैठकर लिया गया निर्णय प्रतीत होता है जिसका असर सीमित होगा और कुछ दिनों में समाप्त हो जाएगा। विरोध व्यक्त करने के लिए यदि हमारे साहित्यकार अन्य सक्रिय तरीके अपनाते जिनमें नैरंतर्य का समावेश रहता जो समाज को लंबे समय तक अनुप्राणित कर सकता तो वह अधिक कारगर सिद्ध होता।

बुधवार, 7 अक्टूबर 2015

बिसाडा के सरताज से हमें और भी सरताज चाहिए!

       
          दादरी के बिसाडा गाँव में गौकसी की अफवाह के कारण हुई मुहम्मद अखलाक की हत्या के बाद उक्त घटना को लेकर पक्ष और विपक्ष के बीच चल रही राजनीति जोरों पर है। पर इस सबके बीच उनके बड़े पुत्र वायुसेना में कारपोरल के रूप में कार्यरत सरताज ने बड़े ही संयम के साथ अपनी बात रखी है जो गौर करने लायक है-
         " हमारी पीड़ा समझने के बजाय राजनीतिज्ञों को अपनी राजनीति की फिक्र है। मेरे पिता की मृत्यु राजनीति का विषय बन गई है। बहुत से राजनीतिज्ञ मेरे घर पर सिर्फ इसलिए आए कि मीडिया में उनका नाम आए।"
          " मेरा परिवार देशभक्त है। इसी कारण मैंने वायुसेना में नौकरी की है। सांप्रदायिक सद्भाव लोकतंत्र का मूल तत्व हैं। हमारा देश सांप्रदायिक सद्भाव के लिए जाना जाता है। मेरी अपील है कि लोग शांति भंग न करें।"
          " न्याय इस प्रकार का होना चाहिए कि एक उदाहरण बने। लोगों के दिमाग से डर दूर करें। यह घटना इस तरह की अंतिम घटना होनी चाहिए। यद्यपि मैं सीमा पर तैनात नहीं हूँ, मैंने समर्पण के साथ देश के लिए काम किया है। मेरा छोटा भाई दानिश भी सेना में जाने के लिए तैयारी कर रहा था। घटना से एक घंटा पहले मैंने परिवार के साथ बात की थी और सब कुछ सामान्य था। बिना किसी कारण के मेरे पिता को मार दिया गया।........कोई उनकी मदद के लिए नहीं आया"।
          इस देश के एक नागरिक के तौर पर हम तुमसे माफी माँगते हैं सरताज! जिन परिस्थितियों में तुम्हारे पिता का इंतकाल हुआ उसमें तुम्हें किस तरह का सदमा पहुँचा होगा ,हम समझ सकते हैं। तुम्हारे ऐसे और भी सरताजों की इस देश को बहुत जरूरत है।
          दादरी की घटना पर एक तरफ गृह मंत्रालय ने राज्यों को एडवाइजरी जारी करते हुए कहा है कि साम्प्रदायिक घटनाओं को जिनसे देश की धर्मनिरपेक्षता कमजोर पड़ सकती है और जिनके द्वारा धार्मिक भावनाओं को भुनाने का प्रयास किया जाए, तनिक भी बर्दाश्त न किया जाए (मंत्रालय ने दादरी की घटना पर उत्तर प्रदेश सरकार से रिपोर्ट मांगी थी जो उसे प्राप्त हो चुकी है)। दूसरी तरफ कृषि राज्य मंत्री संजीव बाल्यान का कहना है कि गोमांस की अफवाह के बाद भीड़ के द्वारा अखलाक की हत्या पूर्वनियोजित न होकर तात्कालिक रूप से घटित हुई और एक हादसा है। उनका यह भी कहना है कि यह साम्प्रदायिक घटना नहीं है और इसे साम्प्रदायिक रंग देने का प्रयास न किया जाए। उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार से गौकसी की घटनाओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने के लिए कहा हैं। बी जे पी विधायक संगीत सोम का कहना है कि अखलाक की हत्या के मामले में पकड़े गए लोग बेगुनाह हैं और सही हत्यारों को पकड़ा जाए। उन्होंने भी कहा है कि वे उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री और राज्यपाल से मिलकर गोकसी करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग करेंगे । साक्षी महाराज और योगी आदित्यनाथ अपने बयान अलग दे रहे हैं। दिनांक 6/10/2015 की रात्रि की एक खबर यह भी है कि भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व ने उत्तेजक बयानबाजी करने वाले अपने नेताओं को दादरी मामले से दूर रहने की सलाह दी है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने घटना की निन्दा करते हुए कहा है कि समाज के सभी जिम्मेदार तत्वों की जिनमें केन्द्रीय और राज्य सरकार शामिल हैं, यह सुनिश्चित करना जिम्मेदारी है कि इस प्रकार की घटनाएँ न घटित हों।
          इन सबसे अलग उत्तरप्रदेश के कैबिनेट मंत्री आजम खान साहब ने संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून को चिट्ठी लिखी है जिसमें गुहार लगाई गई है कि मोदी जी की सरकार आर एस एस और उसके आनुषंगिक संगठनों को परोक्ष सहायता दे रही है ताकि वे अल्पसंख्यक समुदायों को भयग्रस्त कर उनका धर्म परिवर्तन कर दें और भारत 2022-23 तक हिन्दू राष्ट्रीय बन जाए।
          इस विषय पर मेरा अपना मत है कि- 1.यद्यपि केन्द्र सरकार के नं 2 एवं नं 3 यानी कि श्री राजनाथसिंह और श्री अरुण जेटली ने अपना अभिमत दे दिया है तथापि उन्होंने जो बात कही है वह प्रधानमंत्री की तरफ से आनी चाहिए क्योंकि नदी की धारा सदैव पर्वत शिखर से सागर की तरफ बहती हैं। प्रधानमंत्री यदि स्पष्टतः गृह मंत्रालय द्वारा कही गई बात को अपने मुखारबिन्दुओं से व्यक्त करते हैं तो इससे पूरे देश में एक संदेश जाएगा और उनकी अपनी पार्टी के भडकाऊ बयान देने वाले तत्वों पर लगाम लगेगी। यह एक संवेदनशील मसला है और उन्हें इसे अपने मातहतों के सुपुर्द कर निश्चिन्त नहीं हो जाना चाहिए। एक तरफ गृह मंत्रालय तथा अरुण जेटली के बयान और दूसरी तरफ संजीव बाल्यान और संगीत सोम त़था कुछ अन्य भाजपा नेताओं के बयान इस धारणा को बल देते हैं कि सरकार दो स्वर में बोलती है। फिर भी यह एक शुभ संकेत है कि पी एम ओ ने मामले की रिपोर्ट गृह मंत्रालय से माँगी है।
2. स्थानीय भाजपा नेता संजय राणा (जिनके पुत्र की गिरफ्तारी मामले में हुई है) का कहना है कि उन्होंने रात्रि10.26 पर पुलिस को फोन किया। इसी से कुछ मिनट पहले मुहम्मद अखलाक(जिनकी हत्या की गई) ने गाँव के अपने एक मित्र को फोन कर मदद का आग्रह किया था। उसने भी संजय राणा के फोन के कुछेक मिनट पहले पुलिस को फोन किया था । रात्रि में 10.50 पर पुलिस पहुँच गई। इस बीच मुहम्मद अखलाक को मरणान्तक चोट लग चुकी थी तथा उनका छोटा पुत्र दानिश गंभीर रूप से घायल हो चुका था। संजय राणा का यह भी कहना है कि घटना में कोई बाहर का व्यक्ति नहीं था। सभी गाँव के ही लोग थे ।
          यहाँ यह ज्वलंत प्रश्न यह है कि गाँवों की जो संस्कृति है उसमें सभी एक दूसरे को बिना जाति-धर्म के भेदभाव के चाचा,ताऊ, बेटा,भतीजा के रूप में संबोधित करते और जानते हैं। गाँवों का वातावरण इतना सांप्रदायिक या हिंसक कैसे हो गया है कि लोग नाते-रिश्ते भूल कानून को अपने हाथ में लेने लगे हैं और अपनों में से ही किसी की हत्या करने पर उतारू हो गए। गाँवों के वातावरण को विषाक्त होने और वहाँ के सामाजिक संतुलन के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न होने से कैसे बचाया जाए, इस पर विचार करने की जरूरत है।
          रात गए गाँव के मंदिर से लोगों को एकत्रित करने के लिए उद्घोषणा और रात साढ़े दस बजे भीड़ का मुहम्मद अखलाक के घर की तरफ जाना नियोजित हमले की तरफ इशारा करते हैं । इसके क्या कारण थे और इसके पीछे किसका दिमाग था, इस बात की तहकीकात की जरूरत है।
3. श्री आजम खान दादरी के मसले पर जब संयुक्त राष्ट्र संघ को चिट्ठी लिखते हैं तो एक प्रकार से अपनी ही सरकार जिसमें वे मंत्री हैं, की विफलता को स्वीकार करते हैं। उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी प्रदेश सरकार की है। इसलिए कम से कम यह पत्र लिखने के पहले उन्हें समाजवादी सरकार से इस्तीफा दे देना चाहिए था क्योंकि उनका यह कदम बताता है कि उन्हें अपने दल और उसके नेतृत्व तथा स्वयं अपने मुख्यमंत्री पर भी भरोसा नहीं है अन्यथा उनसे बात करने के बजाय वे सीधे संयुक्त राष्ट्र संघ को चिट्ठी क्यों लिखने लगते। दूसरे देश के सबसे बड़े प्रदेश के सत्ताधारी दल के प्रमुख राजनीतिज्ञ के तौर पर उन्हें सीधा यू.एन. जाने के बजाय पहले देश के भीतर अपनी समस्या को उठाना चाहिए था। यू एन जाने का विकल्प यह दर्शाता है कि जैसे इस देश में आजम खाँ के लिए कोई ठौर नहीं रह गया है। यह देश में और बाहर भी एक गलत संदेश देता है। यह दायित्व केन्द्र के साथ- साथ प्रदेश सरकार का भी है कि दादरी जैसी घटनाएँ न हों।
4. सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को इस मसले पर मिल-बैठकर विचार करना चाहिए और इस बारे में एकमत पर पहुँचना चाहिए कि वे गाय नामक निरीह प्राणी के नाम पर राजनीति नहीं करेंगे और न ही किसी के द्वारा इस पर की जाने वाली राजनीति को प्रोत्साहित करेंगे। साथ ही इस प्रकार की सारी स्थितियों को समाप्त करेंगे जो गाय के नाम पर राजनीति को अवसर देती हैं।

बिसाडा के सरताज से हमें और भी सरताज चाहिए!

       
          दादरी के बिसाडा गाँव में गौकसी की अफवाह के कारण हुई मुहम्मद अखलाक की हत्या के बाद उक्त घटना को लेकर पक्ष और विपक्ष के बीच चल रही राजनीति जोरों पर है। पर इस सबके बीच उनके बड़े पुत्र वायुसेना में कारपोरल के रूप में कार्यरत सरताज ने बड़े ही संयम के साथ अपनी बात रखी है जो गौर करने लायक है-
         " हमारी पीड़ा समझने के बजाय राजनीतिज्ञों को अपनी राजनीति की फिक्र है। मेरे पिता की मृत्यु राजनीति का विषय बन गई है। बहुत से राजनीतिज्ञ मेरे घर पर सिर्फ इसलिए आए कि मीडिया में उनका नाम आए।"
          " मेरा परिवार देशभक्त है। इसी कारण मैंने वायुसेना में नौकरी की है। सांप्रदायिक सद्भाव लोकतंत्र का मूल तत्व हैं। हमारा देश सांप्रदायिक सद्भाव के लिए जाना जाता है। मेरी अपील है कि लोग शांति भंग न करें।"
          " न्याय इस प्रकार का होना चाहिए कि एक उदाहरण बने। लोगों के दिमाग से डर दूर करें। यह घटना इस तरह की अंतिम घटना होनी चाहिए। यद्यपि मैं सीमा पर तैनात नहीं हूँ, मैंने समर्पण के साथ देश के लिए काम किया है। मेरा छोटा भाई दानिश भी सेना में जाने के लिए तैयारी कर रहा था। घटना से एक घंटा पहले मैंने परिवार के साथ बात की थी और सब कुछ सामान्य था। बिना किसी कारण के मेरे पिता को मार दिया गया।........कोई उनकी मदद के लिए नहीं आया"।
          इस देश के एक नागरिक के तौर पर हम तुमसे माफी माँगते हैं सरताज! जिन परिस्थितियों में तुम्हारे पिता का इंतकाल हुआ उसमें तुम्हें किस तरह का सदमा पहुँचा होगा ,हम समझ सकते हैं। तुम्हारे ऐसे और भी सरताजों की इस देश को बहुत जरूरत है।
          दादरी की घटना पर एक तरफ गृह मंत्रालय ने राज्यों को एडवाइजरी जारी करते हुए कहा है कि साम्प्रदायिक घटनाओं को जिनसे देश की धर्मनिरपेक्षता कमजोर पड़ सकती है और जिनके द्वारा धार्मिक भावनाओं को भुनाने का प्रयास किया जाए, तनिक भी बर्दाश्त न किया जाए (मंत्रालय ने दादरी की घटना पर उत्तर प्रदेश सरकार से रिपोर्ट मांगी थी जो उसे प्राप्त हो चुकी है)। दूसरी तरफ कृषि राज्य मंत्री संजीव बाल्यान का कहना है कि गोमांस की अफवाह के बाद भीड़ के द्वारा अखलाक की हत्या पूर्वनियोजित न होकर तात्कालिक रूप से घटित हुई और एक हादसा है। उनका यह भी कहना है कि यह साम्प्रदायिक घटना नहीं है और इसे साम्प्रदायिक रंग देने का प्रयास न किया जाए। उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार से गौकसी की घटनाओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने के लिए कहा हैं। बी जे पी विधायक संगीत सोम का कहना है कि अखलाक की हत्या के मामले में पकड़े गए लोग बेगुनाह हैं और सही हत्यारों को पकड़ा जाए। उन्होंने भी कहा है कि वे उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री और राज्यपाल से मिलकर गोकसी करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग करेंगे । साक्षी महाराज और योगी आदित्यनाथ अपने बयान अलग दे रहे हैं। दिनांक 6/10/2015 की रात्रि की एक खबर यह भी है कि भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व ने उत्तेजक बयानबाजी करने वाले अपने नेताओं को दादरी मामले से दूर रहने की सलाह दी है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने घटना की निन्दा करते हुए कहा है कि समाज के सभी जिम्मेदार तत्वों की जिनमें केन्द्रीय और राज्य सरकार शामिल हैं, यह सुनिश्चित करना जिम्मेदारी है कि इस प्रकार की घटनाएँ न घटित हों।
          इन सबसे अलग उत्तरप्रदेश के कैबिनेट मंत्री आजम खान साहब ने संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून को चिट्ठी लिखी है जिसमें गुहार लगाई गई है कि मोदी जी की सरकार आर एस एस और उसके आनुषंगिक संगठनों को परोक्ष सहायता दे रही है ताकि वे अल्पसंख्यक समुदायों को भयग्रस्त कर उनका धर्म परिवर्तन कर दें और भारत 2022-23 तक हिन्दू राष्ट्रीय बन जाए।
          इस विषय पर मेरा अपना मत है कि- 1.यद्यपि केन्द्र सरकार के नं 2 एवं नं 3 यानी कि श्री राजनाथसिंह और श्री अरुण जेटली ने अपना अभिमत दे दिया है तथापि उन्होंने जो बात कही है वह प्रधानमंत्री की तरफ से आनी चाहिए क्योंकि नदी की धारा सदैव पर्वत शिखर से सागर की तरफ बहती हैं। प्रधानमंत्री यदि स्पष्टतः गृह मंत्रालय द्वारा कही गई बात को अपने मुखारबिन्दुओं से व्यक्त करते हैं तो इससे पूरे देश में एक संदेश जाएगा और उनकी अपनी पार्टी के भडकाऊ बयान देने वाले तत्वों पर लगाम लगेगी। यह एक संवेदनशील मसला है और उन्हें इसे अपने मातहतों के सुपुर्द कर निश्चिन्त नहीं हो जाना चाहिए। एक तरफ गृह मंत्रालय तथा अरुण जेटली के बयान और दूसरी तरफ संजीव बाल्यान और संगीत सोम त़था कुछ अन्य भाजपा नेताओं के बयान इस धारणा को बल देते हैं कि सरकार दो स्वर में बोलती है। फिर भी यह एक शुभ संकेत है कि पी एम ओ ने मामले की रिपोर्ट गृह मंत्रालय से माँगी है।
2. स्थानीय भाजपा नेता संजय राणा (जिनके पुत्र की गिरफ्तारी मामले में हुई है) का कहना है कि उन्होंने रात्रि10.26 पर पुलिस को फोन किया। इसी से कुछ मिनट पहले मुहम्मद अखलाक(जिनकी हत्या की गई) ने गाँव के अपने एक मित्र को फोन कर मदद का आग्रह किया था। उसने भी संजय राणा के फोन के कुछेक मिनट पहले पुलिस को फोन किया था । रात्रि में 10.50 पर पुलिस पहुँच गई। इस बीच मुहम्मद अखलाक को मरणान्तक चोट लग चुकी थी तथा उनका छोटा पुत्र दानिश गंभीर रूप से घायल हो चुका था। संजय राणा का यह भी कहना है कि घटना में कोई बाहर का व्यक्ति नहीं था। सभी गाँव के ही लोग थे ।
          यहाँ यह ज्वलंत प्रश्न यह है कि गाँवों की जो संस्कृति है उसमें सभी एक दूसरे को बिना जाति-धर्म के भेदभाव के चाचा,ताऊ, बेटा,भतीजा के रूप में संबोधित करते और जानते हैं। गाँवों का वातावरण इतना सांप्रदायिक या हिंसक कैसे हो गया है कि लोग नाते-रिश्ते भूल कानून को अपने हाथ में लेने लगे हैं और अपनों में से ही किसी की हत्या करने पर उतारू हो गए। गाँवों के वातावरण को विषाक्त होने और वहाँ के सामाजिक संतुलन के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न होने से कैसे बचाया जाए, इस पर विचार करने की जरूरत है।
          रात गए गाँव के मंदिर से लोगों को एकत्रित करने के लिए उद्घोषणा और रात साढ़े दस बजे भीड़ का मुहम्मद अखलाक के घर की तरफ जाना नियोजित हमले की तरफ इशारा करते हैं । इसके क्या कारण थे और इसके पीछे किसका दिमाग था, इस बात की तहकीकात की जरूरत है।
3. श्री आजम खान दादरी के मसले पर जब संयुक्त राष्ट्र संघ को चिट्ठी लिखते हैं तो एक प्रकार से अपनी ही सरकार जिसमें वे मंत्री हैं, की विफलता को स्वीकार करते हैं। उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी प्रदेश सरकार की है। इसलिए कम से कम यह पत्र लिखने के पहले उन्हें समाजवादी सरकार से इस्तीफा दे देना चाहिए था क्योंकि उनका यह कदम बताता है कि उन्हें अपने दल और उसके नेतृत्व तथा स्वयं अपने मुख्यमंत्री पर भी भरोसा नहीं है अन्यथा उनसे बात करने के बजाय वे सीधे संयुक्त राष्ट्र संघ को चिट्ठी क्यों लिखने लगते। दूसरे देश के सबसे बड़े प्रदेश के सत्ताधारी दल के प्रमुख राजनीतिज्ञ के तौर पर उन्हें सीधा यू.एन. जाने के बजाय पहले देश के भीतर अपनी समस्या को उठाना चाहिए था। यू एन जाने का विकल्प यह दर्शाता है कि जैसे इस देश में आजम खाँ के लिए कोई ठौर नहीं रह गया है। यह देश में और बाहर भी एक गलत संदेश देता है। यह दायित्व केन्द्र के साथ- साथ प्रदेश सरकार का भी है कि दादरी जैसी घटनाएँ न हों।
4. सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को इस मसले पर मिल-बैठकर विचार करना चाहिए और इस बारे में एकमत पर पहुँचना चाहिए कि वे गाय नामक निरीह प्राणी के नाम पर राजनीति नहीं करेंगे और न ही किसी के द्वारा इस पर की जाने वाली राजनीति को प्रोत्साहित करेंगे। साथ ही इस प्रकार की सारी स्थितियों को समाप्त करेंगे जो गाय के नाम पर राजनीति को अवसर देती हैं।

शनिवार, 19 सितंबर 2015

दिल में एक हूक सी उठती है!

          अगस्त माह के प्रारंभ में यह महाशय एक दिन यूँ प्रात: मेरे सुपुत्र की पुस्तकों के ऊपर विश्राम करते हुए मिले। मैंने कहा शायद यह पूर्वजन्म के कोई पुस्तक प्रेमी होंगे। इन्हें मेरे घर से और हम लोगों से जाने कैसा लगाव हो गया कि बस जब देखो तब घर में ही मंडराने लगे। एक-दो दिन बाद घर के सामने के बरामदे में सफाई करने आई श्यामा को एक सांप दो टुकड़ों में मिला। श्यामा का कहना था कि उसे इन महाशय ने ही मारा होगा।यदि मेरी श्रीमतीजी इन्हें भगातीं तो मेरे पास आकर अपनी भाषा में कुछ शिकायत सी करते। यदि श्रीमती जी आगे से भगातीं तो पीछे की तरफ से आ जाते। श्रीमतीजी इनके इंटेलीजेन्स का लोहा मान गईं। उन्होंने भी इनसे बातचीत करना शुरू कर दिया । ये अपनी भाषा में बोलते और वो अपनी भाषा में बोलतीं। पर एक दिन इन्होंने हद कर दी। इन्होंने श्रीमती जी के पूजाघर में जाकर पॉट्टी कर दी। उस दिन से श्रीमती जी इन्हें भगाने पर कुछ ज्यादा ही लग गईं। पर यह मानने वाले कहाँ थे ,जब देखो तब चले आते थे। 

           14 अगस्त को जीजाजी आए हुए थे। मैं और वो एक ही कक्ष में सो रहे थे। रात में लगभग 1 बजे इनके म्याऊँ-म्याऊँ के स्वर से नींद खुल गईं। मैंने कह- अच्छा हुआ यहाँ आए हो वरना मालकिन के पास जाकर बोलते तो अभी तुम्हें बाहर करतीं, डिस्टर्ब मत करो और सो जाओ। इसके बाद मैं पुनः सो गया। 

           अगले दिन दोपहर में जब मैं दोपहर में कार्यालय से घर खाना खाने आया तो श्रीमतीजी मुझसे शोक संतप्त स्वर में बोलीं- 'सुनिए जी,वो बिल्ली का बच्चा मर गया ',  मैं अवाक रह गया।  ' पर वो रात में तो कमरे में था' - मैंने कहा। 'हाँ, पर श्यामा उसे रोटी देने गई तो वह पेड़ के पास मरा पड़ा था। श्यामा कह रही है कि उसे कुत्तों ने मार दिया।'  मैंने कहा कि हो सकता है कि वो कोई और हो पर अगले दिन से जब यह महाशय कई दिन तक नहीं दिखाई दिए तब यह सुनिश्चित हो गया कि श्यामा द्वारा दी गई खबर सही थी।अब इनकी यह तस्वीर ही स्मृति रूप में शेष है जिसे देख कर दिल में हूक सी उठती है।

गुरुवार, 17 सितंबर 2015

Dengue and Swachchha Bharat Abhiyan(Clean India Drive)


          News of Dengue epidemic in Delhi reminds me of an incident of last year. One year ago on 15th of August little Pragyan (6 years old) was with us. She had come from U S A along with her family. Her mother is my sister-in-law. We visited many places of Kolkata along with her. On 15th of August we went to Garia Hat Junction. While her mother was busy shopping with my wife, I was taking care of Pragyan. In the hot and humid weather of Kolkata Pragyan became restless and so leaving her mother for shopping, I took Pragyan to my sister's house which was nearby. After resting for sometime in a room which was A.C. cooled, she became her usual self and started singing & dancing. After sometime, I listened her singing while swaying- "Tomorrow I'll go to my favourite country,I''ll go to U S."  I asked her if U S was her favourite country. She confirmed it in affirmative. I again asked her- " Is India  not your favourite country". "Yes,I like India but India is not my favourite country."   "Why?", I again asked. "Because there is so much filth and squalor here", she replied. After sometime she asked-" Why is no fine imposed here when people through garbage on the road ?" I had no answer,so I kept mum. She said again-" In U S, if you litter on the road you have to pay 200 Dollars" . I was looking for an answer to save honour of my country. That morning I had listened Prime Minister's speech from the ramparts of Red Fort wherein he had announced that" Swachh Bharat Abhiyan" will be started to make India neat & clean. So I took a refuge under P M`s speech. I told Pragyan , that day our P M had made announccement that "A swachchh Bharat Abhiyan" would be started. I assured her when she would come back next time to our country,she would find a neat and clean India.

          But after one year when I look at the situation around me, I feel still a lot has to done. After Govt. announcement of " Swachchha Bharat Abhiyan", there is some improvement but not overall improvement. The basic reason is, after the P M started the 'Swachchha Bharat Abhiyan' last year on Gandhi Jayanti, Govt. officials used it for photo-ops with brooms and after an initial enthusiasm of a few days, the movement has been forgotten and now it seems that the programme has even lost steam . For its sucess 'Swachchha Bharat Abhiyan' has to be a permanent feature and not 'once a year rhetoric'.

       Day before Yesterday, I was at Syaldah station. It had rained for nearly fifteen minutes and the surroundings around Syaldah could be seen in pathetic condition. Being one of the main Railway Stations of a prominent Metropolis we should be able to showcase it for others, but alas! It is not so.

          Had we taken P M's 'Swachchha Bharat Abhiyan' to our heart and ensured a neat and clean Delhi with no scope for water logging ,filth and squalor ; we won' t have had to listen such news that there were no beds available for Dengue patients in the hospital and twenty lives have been lost to Dengue. A fairly good number are of young children! It is heart wrenching to see people crying for their young ones who have been lost to Dengue and could have been saved if citizens of country as well as civic authorities and administration been vigilant to maintain cleanliness.

          To be on par with other leading nations of the world, it is necessary that we inculcate habit of cleanliness in every citizen of our country, ensure that our public places are neat and clean, no one litters or throws garbage on the road or unspecified places and there is a proper disposal system for the solid as well as liquid waste. Cleanliness drive has not to be an annual ritual or once a year affair . It has to be part of our daily routine and become a habit with us.We have to be ever vigilant to ensure neat and clean surroundings.

          While Municipalities and Govt. officials have to play an important role in" Swachchha Bharat Abhiyan" , it must be kept in mind and also ensured that every Indian citizen plays an equally important role. To fulfill the purpose, inspiration and punishment both have to be utilised as tools. Govt. should not hesitate to take help of NGOs and all kind of other institutions. Only then " The Swachchha Bharat Abhiyan " could truly be successfull. Let us not wait for Gandhi Jayanti.