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मंगलवार, 8 मार्च 2016

~ वामपंथी मित्रों के साथ राष्ट्रवाद पर बहस ~

~ वामपंथी मित्रों के साथ राष्ट्रवाद पर बहस ~

रघुवंशमणि : "जिभकट्टू राष्ट्रवाद" - इस शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम मैंने किया है।देश की वर्तमान स्थिति को देखते हुए लगता है इस शब्द का प्रयोग भविष्य में बहुत अधिक होना है । इसलिए मैं इस शब्द को पेटेंट करा लेना चाहता हूँ।भाषाशास्त्री यदि भविष्य में इस शब्द पर चर्चा करें तो इस बात का जिक्र अवश्य करें कि इस शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम रघुवंशमणि ने 7-3-2016 को किया था।इस शब्द का प्रयोग कोई भी कर सकता है। मुझे इस पर कोई आपत्ति नहीं। यदि राजनीति विज्ञान के विद्वान इस पर कार्य करेंगे तो मुझे विशेष प्रसन्नता होगी।

स्वप्निल श्रीवास्तव : यह कट्टर के आगे का शब्द है । कुछ हिंसक जैसा भाव है।

दिनेश चौधरी ः गलकटराष्ट्रवाद का पेटेंट मेरे नाम करें।

डा राधेश्याम सिंह : हलकट राष्ट्रवाद बनाम गलकट राष्ट्रवाद

मेरी टिप्पणी- डा राधेश्याम सिंह ने हलकट शब्द का प्रयोग किया है तो संभवतः उन्हें यह जानकारी भी हो कि मराठी में इसे abusive term समझा जाता है और मुंबई में इस शब्द का प्रयोग गाली देने के लिए किया जाता है!

रघुवंशजी : हलकट का शाब्दिक अर्थ क्या है? "हलकट जवानी" जैसा कोई गीत है जो खुले आम बजता है।

मेरी टिप्पणी- फिल्मों में तो बहुत कुछ हो रहा है । भाग डी के बोस डी के...... जैसे गाने भी बन चुके हैं । एक जमाना ऐसा भी आएगा, मैंने सोचा नहीं था। बहरहाल मुझे लगता है कि राष्ट्रवाद मजाक का विषय नहीं होना चाहिए, न ही इसका ठेका किसी पार्टी या संगठन विशेष के पास होना चाहिए। वे वामपंथी भी राष्ट्रवादी ही थे जिन्होंने राष्ट्रवाद के लिए फांसी के फंदे को चूमा- भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव। वो जिसने जनेऊ नहीं छोड़ा था पर हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी का सेनापति था। सुभाषचंद्र बोस भी वामपंथी थे भले ही अपने राष्ट्रवाद के कारण उन्होंने धुरी राष्ट्रों से मदद लेने में संकोच नहीं दिया। वामपंथ और राष्ट्रवाद का आपस में कोई विरोध नहीं है। दिग्भ्रमित नक्सली वामपंथियों का भले राष्ट्रवाद से विरोध हो।मैं नहीं समझ पाता हूँ कि क्यों दोनों को एक दूसरे के विरोध में खड़ा किया जा रहा है। भले ही मार्क्स ने सार्वभौमिक साम्यवाद को सिद्धांतत: प्रतिपादित किया हो; लेनिन, स्टालिन, माओ और चाऊ एन लाई से लेकर डेंग शियाओ पेंग और फिडेल कास्ट्रो तक सभी राष्ट्रवादी थे।

जनविजय- जिस देश में डेढ़ सौ से ज़्यादा राष्ट्रीयताओं के लोग रहते हों, वहाँ राष्ट्रवाद की बात करना बेवकूफ़ी है। भूमण्डलीकरण के इस ज़माने में तो जापानी और जर्मन राष्ट्रवाद भी ख़त्म हो रहे हैं।

मेरी टिप्पणी- संभव है जन विजय जी कि मैं मूर्ख होऊँ। पर मेरा विचार है कि निश्चय ही जिस देश में विभिन्न राष्ट्रीयताओं के लोग रहते हों वहाँ उन्हें आपस में जोड़ने के लिए कुछ चाहिए और यह भारतीयता है जो हम सबको जोड़ती है।यदि आप 130 करोड़ भारतीयों के हित की बात सोचते हैं तो मेरी नजर में यही राष्ट्रवाद है और आप राष्ट्रवादी हैं। मैं किसी पार्टी या संगठन के आइने के अनुसार राष्ट्रवाद को नहीं देखता हूँ।यदि आप विभिन्न राष्ट्रीयताएं जिन्हें आपने इंगित किया है,के बीच जुड़ाव नहीं चाहते हैं तो बात दूसरी है । मुंबई में मेरे एक मित्र एस पी चक्रवर्ती हैं जो ट्रेड यूनियन लीटर और die-hard communist हैं । सोवियत रूस के विघटन के बाद मेरी उनसे उसी तर्ज पर विभिन्न राष्ट्रीयताओं वाला देश होने के कारण भारत के विघटन की संभावना के बारे में चर्चा हुई। चक्रवर्ती जी ने मेरी बात का पुरजोर विरोध किया और परिचर्चा के दौरान बहुत उत्तेजित हो गए। एस पी चक्रवर्ती जी ने सोवियत रूस के विघटन की परिस्थितियों से भारत की परिस्थितियों को भिन्न बताते हुए और उन तत्वों को इंगित करते हुए जिन्होंने भारत को जोड़ रखा है, ऐसी किसी भी संभावना को खारिज किया । 

जहाँ तक भूमण्डलीकरण की बात है यदि वह उस सीमा तक वास्तविकता बन गई है कि राष्ट्रीयता गौण हो गई है तो विभिन्न देशों को borderless हो जाना चाहिए, विभिन्न देशों की सीमाओं पर सेना नहीं होनी चाहिए, दुनिया में कहीं भी आने-जाने की स्वतंत्रता होनी चाहिए, वीजा-पासपोर्ट की कोई जरूरत नहीं होनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं है तो ग्लोबलाइजेशन की सारी बातों के बावजूद राष्ट्र और राष्ट्रीयता एक वास्तविकता है तथा अपने राष्ट्र के हित की बात सोचना राष्ट्रवाद है। ग्लोबलाइजेशन के नाम पर संपन्न राष्ट्र अपने लिए बड़ा बाजार चाहते हैं पर कुछ देने को तैयार नहीं हैं। मात्र संचार संबन्धी उपलब्धता को या कुछ अंतर्राष्ट्रीय सहयोग कार्यक्रमों को ग्लोबलाइजेशन कहना कहाँ तक समुचित है यह विचारणीय है। जापान में यदि राष्ट्रवाद समाप्त हो रहा है तो जापान अमेरिका और आस्ट्रेलिया के साथ मिलकर प्रशान्त महासागर और चाइना-सी की निगरानी की योजना क्यों बना रहा है और उसमें भारत को भी शामिल करने का प्रयास क्यों कर रहा है(भारत ने इससे इनकार कर दिया है), पुनश्च जापान अपना रक्षा बजट क्यों बढ़ा रहा है?जर्मनी में यदि राष्ट्रवाद समाप्त हो गया है तो जर्मनी में सीरिया से आने वाले शरणार्थियों की संख्या नियंत्रित करने और उन्हें जर्मन संस्कृति से परिचित कराने की बात क्यों हो रही है? आदर्श और वास्तविकताएं अलग-अलग हैं। राष्ट्रवाद एक उत्कृष्ट भावना है जिसे राजनैतिक मुद्दा बनाने का कुछ लोग अवसर ढूँढ रहे थे और इस प्रकार की प्रतिक्रियाएं उन्हें यह अवसर प्रदान कर रही हैं।

डा राधेश्याम सिंह : ए हलकट भी हलक काट का मुखसुख संक्षेपीकरण लगता है।मेरा अभिप्राय दोनों ही पक्ष के संशुद्धतावादी राष्ट्रवादियों का निषेध करना था।आशा है संजय जी और रघुवंश जी ने मेरे दुख को समझा होगा।

रघुवंशजी : संजयजी कुछ ज्यादा ही अकादमिक हैं। लेकिन हलकट का मराठी अर्थ साफ़ नहीं हुआ।

मेरी टिप्पणी : रघुवंशजी हर चीज का शाब्दिक अर्थ खुले मंच पर लिखने लायक नहीं होता। बहरहाल अगर कोई तमाशा देखना चाहे तो मुंबई में किसी मराठीभाषी के आगे यह शब्द उच्चारित कर दे और फिर तमाशा देखे। डा राधेश्याम सिंह की व्याख्या से स्पष्ट हुआ कि उन्हें भी इसका अर्थ ज्ञात नहीं है। मुझे लगा था कि हो सकता है कि वे मराठी से परिचित हों या मुंबई में रहे हों और अर्थ जानते हों।

रघुवंशजी : राष्ट्रवाद कोई पवित्र चीज नहीं जिस पर बहस न की जाए। हिटलर के दौर में भी एक राष्ट्रवाद था और मुसोलिनी के समय में  भी। भारत में आज राष्ट्रवाद का उपयेग अपने विरोधियों से निपटने के लिए किया जा रहा है। ऐसे में इस प्रकार के राष्ट्रवाद की आलोचना करना जरूरी हो गया है।

मेरी टिप्पणी : पवित्र वस्तु भी आलोचना के दायरे से बाहर नहीं कही जा सकती।पर कोई भी आलोचना सोद्देश्य होनी चाहिए महज राजनैतिक विरोध के लिए नहीं। राष्ट्रवाद एक अवधारणा है। यह अवधारणा क्या हो कैसी हो यह विवेचन का विषय हो सकता है। यह अवधारणा ही न हो यह भी विवेचन का विषय हो सकता है। पर मुझे लगता है कि आपका उद्देश्य इस अवधारणा का दुरुपयोग करने वालों को कटघरे में खड़ा करना है। ऐसे में जब आप राष्ट्रवाद की आलोचना करने में लग जाते हैं तो अपने मूल उद्देश्य से भटक जाने की संभावना है। फिर आप राष्ट्रवाद के नाम पर आज तक जो भी हुआ है यहाँ तक कि हमारी स्वतंत्रता की पूरी लड़ाई पर भी प्रश्न खड़ा कर रहे हैं। आप उन पर भी सवाल खड़ा कर रहे हैं जिन्होंने राजनैतिक दलों और श्रमिक संगठनों के साथ राष्ट्रीय शब्द लगा रखा है क्योंकि वह भी राष्ट्रवाद को ही द्योतित करता है। उन समस्त पूर्ववर्ती महापुरुषों पर भी सवाल खड़ा कर रहे हैं जिन्होंने राष्ट्र, राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद की बात की। पर नि:संदेह प्रश्न आप किसी पर भी खड़ा कर सकते हैं और उसका आपको अधिकार है । पर आपको यह भी बताना चाहिए कि कुछ लोगों या संगठनों के कारण आप पहले की राष्ट्रवाद संबन्धी पूरी धरोहर को क्यों खारिज कर देना चाहते हैं।


रविवार, 6 मार्च 2016

Speech of Kanhaiya Kumar after his bail - Revisited.

~ Speech of Kanhaiya Kumar after his bail - Revisited ~

                             A
"Is it wrong to ask for azadi from the problems that are existing in the country? Brothers, it's not from India, but it's in India that we are seeking Azadi . And there is difference between 'from ' and 'in'. The Azadi we are asking for is from starvation and poverty, from exploitation and torment; for the rights of Dalits, tribals,minorities and women. And the azadi we will ensure through this very constitution, Parliament and judiciary.This was Baba Saheb's dream,and this is Comrade Rohith's (Vemula) dream."- Kanhaiya Kumar as quoted by TOI

My comment: Brother, certainly it is not wrong to ask for azadi from the problems that are existing in the country ! But it is wrong if you camouflage aspirations of those who want azadi from India as azadi from problems existing in the country. It is wrong when you provide a platform to the separatists or let them hijack your platform for their purposes and provide a respectability to their cause from the Sanctum Santorum of a respected institution like J N U. For that you should accept responsibility. Gandhiji stopped non-cooperation movement after Chaurichaura happened.

        You are quoting Baba Saheb but forget that he was firmly opposed to separatist politics. When you quote Baba Saheb and Rohith Vemula along with, YOU forget that Baba Saheb was a great fighter who never surrendered before adversities.He fought all the odds and made a place for himself or rather you can say, snatched the place for himself. Despite of all the problems he faced in life due to caste barrier, he did not have any grudge towards anyone. When he was entrusted with the responsibility of Drafting Constitution, he gave his best to the country. Rohith can not be placed on the same pedestal. Fighter in him surrendered before adversities. When I'm writing this piece, I know the risks involved and ready to face consequences. If any adversity is presented before me I would fight and not surrender. So when Rohith championed a cause, he should have fought and not surrendered. 

          When you say you have full faith in constitution and stand by the preamble please don't quote those as your ideals who espoused or espouse cause of separatists. I believe you on your words and also that you don't support the separatist cause and also that your programme was hijacked by separatists. If any democratic element is ready to give any leverage to separatists, separatists  are ready to use him as a pawn in their game under the garb of democracy.

          There are crores of Dalits in this country who love this country despite of all their problems.They don't support dismemberment of this country and would never ally with separatists.Baba Saheb is their ideal but certainly no person having sympathy for separatists can be their ideal.

                              B
"When I was in jail, I got two bowls - one was blue coloured, and the other red.I was looking at those bowls and thinking- I don't believe in fate,neither I do have faith in God.But a red bowl and a blue bowl on the same plate means something good is going to happen in the country. That plate looked like India to me; the blue bowl the Ambedkar movement and the red bowl the left movement. I felt that if the two movements unite.....we will form a government that ensures justice for all. We will establish. 'sabka sath sabka vikas' in the real sense" (Kanhaiya Kumar as quoted in TOI)

My comment: So ultimately left has got its own social engineer. So far every party has been trying social engineering as an easy way of getting votes in hordes. But communists had not tried this so for.They talked of poors and classes. Now Kanhaiya Kumar sees left as such a big movement that by making Dalits only ride the band wagon of left he would be able to see the left through the elections and even be able to form a Govt. Here he seems too much optimistic to me and it also seems that the optimism has made him myopic. First of all left needs to be taken to the level that by having only Dalits on its side it is able to get majority. Seeing left's downward slide in the last decade it seems improbable. Secondly getting Dalits on the communist bandwagon is not that much easy. They already have their political affiliations and not going to leave it in favour of someone only because he says Rohith Vemula is his ideal. The way Kanhaiya Kumar talks of social engineering, to me he seems like other politicians and not different from them. Moresover, for this he is ready to dump class theory of communism and folllow in Lohiya's shoe steps ,so he doesn't seems committed to communist ideology either. So I don't see as much promise in him , as much is being seen by the media.

                                 C
"Afzal Guru. ......was punished as per the law of land and the same law permits citizens to discuss that punishment. (Kanhaiya Kumar as quoted in TOI)"

मेरी टिप्पणी: भइया बाएं हाथ से दायां कान पकडने की कोशिश क्यों कर रहे हो? सीधे-सीधे दाएं हाथ से दायां कान पकड़ो न!

शनिवार, 5 मार्च 2016

~ लोकतांत्रिक पूँजीवाद बनाम साम्यवादी अधिनायकवाद ~

~लोकतांत्रिक पूँजीवाद बनाम साम्यवादी अधिनायकवाद~

         लोकतांत्रिक पूँजीवाद में कम से कम वस्तुओं की शेल्फ लाइफ कम होने के कारण नए-नए नायक लांच होते रहते हैं । इस प्रकार इसमें नए प्रयोगों के लिए स्थान है।

         पर साम्यवादी व्यवस्था में तो एक बार नायक जम जाए तो उसके मरने या बीमार पड़ कर अशक्त हो जाने तक या किसी षडयंत्र के सफल हो जाने तक दूसरे नायक के लिए कोई स्थान नहीं रहता था । चीन ने इस साम्यवादी परंपरा को तोड़ा है परंतु यहीं यह भी ध्यान देने योग्य है कि उसने पूँजीवाद के बहुत से तत्व अपना लिए हैं। 

        लोकतांत्रिक पूँजीवाद कम से कम हर नायक को कुछ दिनों के बाद उसकी औकात बता देता है और उसे वास्तविकता के धरातल पर उतार देता है। 

        विशुद्ध पूँजीवाद और विशुद्ध साम्यवाद दोनों ही व्यवस्थाएँ मानव के हित में नहीं हैं । यदि पूँजीवाद के साथ साम्यवाद के मूल में जो जन चिन्तन है वह समाहित हो जाए(और यह जनचिन्तन साम्यवाद के अंतर्गत स्थापित होने वाले अधिनायक तंत्र में तिरोहित हो जाता है क्योंकि अधिनायकवाद भले ही वह पूँजीवादी हो या साम्यवादी, अंततोगत्वा स्वहितवाद में तब्दील हो जाता है) तो वह मानव के लिए हितकारी होगा। 

       बिल गेट्स जिन्होंने पूँजीवादी व्यवस्था में पैसा कमाया और फिर अपनी कुल सम्पत्ति का लोकहित के लिए दान कर दिया है स्टालिन, माओ, चाऊ-एन-लाई, ख्रुश्चेव, ब्रेझनेव और फिडेल कास्ट्रो जैसे साम्यवादियों से लाख बेहतर हैं। डेग-शियाओ-पेंग को मैं इन साम्यवादी नेताओं की सूची में नहीं रख रहा हूँ क्योंकि वह साम्यवादी की खाल ओढे हुए पूँजीवादी थे।

सोमवार, 29 फ़रवरी 2016

छूटा हुआ सामान आपको पकडाती है (गजल)

छूटा हुआ सामान आपको पकडाती है
'सर, टेक केयर प्लीज' कह वो मुस्कुराती है।

पापी पेट के लिए वो अपना आराम छोड़
 दिन तो कभी रात यह ड्यूटी बजाती है।

किसी की माँ,बहन- बेटी या पत्नी है
 पर उन्हें सोता छोड़ भी चली आती है।

लड़की जो विशेष वेशभूषा में सजी हुई है
आपको देख भोर चार बजे मुस्कुराती है।

सच्ची-झूठी-बनावटी एयरपोर्ट पर
कई तरह की मुस्कराहटें नजर आती हैं।

कभी-कभी ही नजर आती है 'संजय'
वो मुस्कराहट जो दिल को पकड़ पाती है।


रविवार, 28 फ़रवरी 2016

  मैं हिन्दुस्तान हूँ..........! ( भारत की व्यथा)

          मैं हिन्दुस्तान हूँ। हाँ वही जिसे विदेशी और खुद को ज्यादा पढ़ा- लिखा समझने वाले इंडिया कहते हैं और जिसे पंडितों द्वारा उच्चारित 'जम्बूद्वीपे भरतखण्डे....' से निकालकर सन 1947 में भारत नाम दे दिया गया क्योंकि कभी हस्तिनापुर नरेश के रूप में किसी भरत नामक प्रतापी राजा ने राज्य किया था। मैं बहुत बूढ़ा हूँ, शायद दुनिया के सबसे बूढ़े मुल्कों में से एक हूँ!

          एक जमाना था जब ढाई-तीन हजार साल पहले मेरे बच्चे शास्त्रार्थ किया करते थे और तब किसी निष्कर्ष पर पहुँचा करते थे। हर कोई अपनी राय रखने के लिए स्वतंत्र था। शास्त्रार्थ में हार जाने के बाद लोग विजयी व्यक्ति की बात मान लेते थे, यहाँ तक कि अपना मत छोड़ विजयी के मतानुयाई बन जाया करते था। मेरे एक महान सुपुत्र बुद्ध को इसी तरह अपने आरंभिक अनुयाई मिले थे जो बौद्ध बन गए पर ब्राह्मण थे और पहले ब्राह्मण धर्म के अनुयाई थे। तब विभिन्न मत-मतांतरों के अनुयाइयों के बीच कोई दुराव नहीं था, हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं था।

          जो सुविख्यात हो वह तमाम लोगों की नजरों में चढ़ जाता है । मेरे साथ भी यही हुआ । सिकंदर पहला विदेशी था जिसकी नजर मेरे ऊपर पडी और आखिर एक दिन वह मेरे दरवाजे पर आ ही गया। पर वह बहादुरों और विद्वानों का कद्रदान था। बेचारा यहीं एक युद्ध में घायल हो गया और कुछ समय बाद अपने थके-हारे सैनिकों के दबाव में आकर लौट गया पर घर नहीं पहुँच पाया, चोट उसके लिए जानलेवा साबित हुई। वह अपने कुछ राज्य यहाँ बना गया था। पर उसके देश के लोगों ने बाद में मेरे यहाँ प्रचलित धर्म ही अपना लिए और पूरी तरह मेरे अपने बन गए। इस दौरान बहादुर चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने गुरू चाणक्य के साथ मिलकर मेरी यशोवृद्धि की। उसका पोता अशोक, गौतम बुद्ध का अनुयाई बन चण्डाशोक से धम्माशोक बन गया और मेरी प्रतिष्ठा उसने तत्कालीन विश्व में चतुर्दिक फैला दी। वैसी प्रतिष्ठा आगे चलकर गुप्त सम्राटों के समय भी मुझे न मिल सकी, भले ही उनके समय मेरी समृद्धि शिखर पर पहुँच गई और उनके युग को मेरा स्वर्णयुग कहा जाने लगा ।

          मेरी समृद्धि से ललच कर हूण ,शक,और कुषाण भी विदेशों से आए। वह कभी जीते, कभी हारे। उन्होंने अपने राज्य भी बना लिए । पर अंत में पूरी तरह भारतीय बन गए और मेरे रंग में रंग गए। कुषाण कनिष्क ने तो बौद्ध धर्म अपना लिया और मेरी प्रतिष्ठा में अपार वृद्धि की।

          पर इस सबके दौरान मेरे बच्चों में एक प्रकार की संतुष्टि का भाव भर गया जिसके कारण उनकी पिपासाएं मर गईं और इसका परिणाम हुआ कि उन्नति शिथिल पड़ गई और अंत में प्रगति बंद हो गई।

          ऐसे ही समय में पश्चिम से एक बार फिर हमले शुरू हुए। यह हमला करने वाले एक नए धर्म इस्लाम के अनुयाई थे। यह अपने धर्म और राज्य को फैलाने के लिए अपार उत्साह से भरे हुए था। शुरू में इन्हें आशातीत सफलता नहीं मिली, यह आए और हमले कर लौट भी गए। बाद में इन हमलों का उद्देश्य बुतशिकन का खिताब हासिल करने के अलावा लूटपाट करना हो गया।

          मुस्लिम आक्रमणकारी मुहम्मद गोरी के साथ  आया कुतुबुद्दीन ऐबक  गुलाम वंश का पहला शासक था जिसने यहीं बस जाने का निर्णय किया। इसके साथ ही भारत में बड़े पैमाने पर इस्लाम का आगमन हुआ। हिन्दू और मुस्लिम धर्म आमने- सामने खड़े हो गए जिसमें प्रगतिविहीन हुआ हिंदू धर्म, मुस्लिम आक्रंताओं के सामने टिक न सका। पर एक बात यह हुई कि इस्लाम की आँधी हिन्दुस्तान में थम कर रह गई, वह इसके रास्ते और पूरब में न बढ़ सकी। इस्लाम धर्म और हिन्दू धर्म में जहाँ एक ओर प्रतिस्पर्धा हुई वहीं दोनों धर्मों ने एक- दूसरे से बहुत कुछ ग्रहण भी किया। हिन्दुस्तान में इस्लाम की एक धारा सूफियत खूब फली-फैली जिसमें इस्लाम का वह चेहरा नजर आया जहाँ हिन्दू धर्म के भक्तिवाद के तत्व और रहस्यवाद कंधे से कंधा मिलाए नजर आते हैं ।

          आगे चलकर मेरे बेटे अकबर ने जिसकी सोच अपने वक्त से आगे की थी,हिन्दुत्व और इस्लाम के बीच की दीवार तोड़ने की कोशिश की। सुलह कुल की नीति प्रतिपादित की और एक नया धर्म दीने- इलाही तक चला डाला। उसका नया धर्म तो नहीं चला पर मेरी ख्याति की लहरें मौर्य और गुप्त युग की तरह एक बार फिर विदेशी समुद्रतटों से जाकर टकराने लगीं और मेरी गिनती विश्व के महानतम और समृद्धतम राष्ट्र के रूप में होने लगी। मैं अपने भाग्य पर इठलाने लगा।

          पर अकबर के परपोते औरंगजेब ने इस्लाम की श्रेष्ठता में यकीन करते हुए अकबर की नीतियों को उलट दिया और यहीं से मुगल साम्राज्य की उल्टी गिनती शुरू हो गई। औरंगजेब ने इतने सारे मोर्चे खोल दिए कि वह तो इनका भार संभाल सका पर उसकी आने वाली पीढ़ियाँ इसमें अक्षम सिद्ध हुईं। अन्य कोई भारतीय शक्ति भी उनका स्थान नहीं ले पाईं। नतीजा वही हुआ जो होना चाहिए था । कुछ विदेशी चालाक गौरांग व्यापारियों ने एक-एक कर सारी भारतीय शक्तियों को हराया और इस प्रकार मुझे उनका और बाद में उनकी महारानी का गुलाम बनना पड़ा ।

          मेरे कुछ बच्चों ने बहुत संघर्ष किया। विदेशी शक्ति ने मुझे गुलाम बनाए रखने के लिए सारे हथकण्डे अपनाए। मजहब की दीवार लोगों के बीच खड़ी करने की कोशिश की। पर मेरे बच्चों ने अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया । हर तरह की कुर्बानी दी। विदेशी शक्ति के हर तरह के जुल्म सहे। उनका बलिदान व्यर्थ नहीं गया और आखिरकार मैं आजाद हुआ। पर कुर्बानी मुझे भी देनी पड़ी। मजहब के नाम पर मेरा अंग-भंग कर दिया गया। उस समय मेरे दो टुकड़े कर दिए गए जिनके आज तीन टुकडे हो गए हैं।

          पर इस सबके बीच भी मैं मजबूती से चट्टान की तरह खड़ा रहा । मुझे चोटें लगीं पर मेरा भाल उन्नत रहा । मेरी आत्मा अक्षुण्ण रही । खंडित कर दिए जाने के बावजूद 1947 में मैं, जो शायद इस दुनिया के सबसे बूढ़े राष्ट्रों में एक हूँ, खुद को एक बार फिर जवान महसूस करने लगा क्योंकि मुझे अपने बच्चों पर नाज था। उन पर मुझे विश्वास था कि वे मुझे एक नया हिन्दुस्तान बना देंगे जो चन्द्रगुप्त मौर्य, अशोक महान, चंद्रगुप्त विक्रमादित्य और अकबर महान के समय जैसा समृद्धशाली, गौरवान्वित और विश्व का समुन्नत राष्ट्र होगा।

          पर आज मेरे कुछ बच्चे जो कर रहे हैं उसने मेरा दिल तोड़ दिया है। अगर किसी बूढ़े बाप के अपने बच्चे उसकी बर्बादी तक जंग जारी रखने का ऐलान कर दें तो उसकी आत्मा जर्जर नहीं होगी? अगर किसी बाप के अपने बच्चे उसके टुकड़े करने का ऐलान करें तो क्या उसकी स्थिति जीवित मरे के समान नहीं होगी ? अगर किसी बाप के अपने बच्चे उस पर हमला करने वाले की याद में सालाना जलसा करेंगे तो क्या उसका दिल उसे नहीं कचोटेगा। जम्हूरियत के तले झंडा उठाने वाले लोग जब जम्हूरियत पर हमला करने वालों की तरफदारी करते हैं और इसे उनका बोलने का हक बता कर उसकी वकालत करते हैं तो मेरी आत्मा को जो चोट लगती है वह शायद इसके पहले कभी नहीं लगी।


          जैसा कि मैंने आरंभ में कहा है आपस में शास्त्रार्थ कर लो और एक नतीजे पर पहुँच जाओ,बिना किसी हिंसा के । अपनी बात कहो और दूसरे को भी कहने का हक दो, उसकी भी सुनो। यह आज की संसदीय परंपरा ही नहीं है बल्कि जैसाकि मैं कह चुका हूँ, मेरे बच्चे ढाई-तीन हजार साल पहले से इस पथ पर चलते आ रहे हैं। 

          जहाँ तक मुझे खंडित करने की बात है, तमाम लोगों की ऐसी तमाम कोशिशों के बावजूद मैं दुनिया का सबसे बूढ़ा राष्ट्र, आज भी जिंदा हूँ और आगे भी रहूँगा। चंद सिरफिरे नारेबाजी कर मुझे तोड़ नहीं सकते। अगर नारों से ये दुनिया चलती होती तो तो पता नहीं क्या-क्या हो चुका होगा। जम्हूरियत के झंडाबरदारों (चुनाव में हारे और जीते दोनों पक्ष) इस मुल्क के लोगों की तरक्की का बीड़ा तुमने उठाया है तो चंद गुमराह लोगों के पीछे वक्त न जाया कर अपने इस ज़िम्मेवारी को पूरा करो ताकि इस देश के वे लोग जिनकी जिंदगी में अँधेरा है, उजाले के दर्शन कर सकें। 

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2016

~ मेघदूत से मुलाकात (व्यंग्य) ~      

              ~ मेघदूत से मुलाकात ~
        वायुयान अपनी संपूर्ण गति से अग्रसर था। दूर कहीं क्षितिज का अहसास भर हो रहा था गोया कि वह वायुमंडल के अथाह सागर में नीचे कहीं था जहाँ से उसका दिखना दुर्लभ था । क्षितिज के ऊपर बादलों ने जैसे एक दीवार बना रखी थी जो वायुयान की खिड़की से दूरस्थ नजर आ रही थी । नीचे भूमि चौकोर, आयताकार, वर्गाकार हरे, भूरे और खाकी टुकड़ों में नजर आ रही थी। मैंने अंदाज लगाया कि जो हरे टुकड़े दिख रहे हैं वे खड़ी फसल के हैं जो अभी पकी नहीं है, भूरे और कत्थई टुकड़े पक चुकी फसल के हैं। खाकी टुकड़े वे हैं जहाँ फसल कट चुकी है। इन आकृतियों के बीच- बीच कहीं चौड़ी, कहीं पतली और बारीक रेखाएँ जो कहीं सीधी तो कहीं टेढ़ी- मेेढ़ी थीं,आती- जाती हुई दिखाई दे रही थीं। यह शायद नदियाँ, नाले, सड़कें और पगडंडियाँ हैं जिन्हें ऊपर से पहचानना मुश्किल है, मैंने सोचा। बीच-बीच में कुछ छोटी-छोटी आकृतियाँ का समूह सा दिखता जो शायद इंसानी बस्तियाँ थीं।

       तभी मुझे खिड़की के पास बादल का एक टुकड़ा दिखाई दिया जो बड़ी जल्दी में कहीं जा रहा था। मैंने उससे बातचीत शुरू कर दी-
 "मेघ भाई इतनी शीघ्रता में कहाँ चल दिए? कौन सी विरहिणी  प्रियतमा ने तुम्हें अपने प्रिय के पास संदेश लेकर भेजा है?"

"तुम अभी भी कालिदास के जमाने में हो? मेघों से ये ड्यूटी कब की छिन चुकी है । अब मोबाइल है, एस एम एस है, व्हाट्स ऐप है, फेसबुक है जहाँ एक वर्चुअल दुनिया है और लोग वर्चुअल प्रेम तक कर डालते हैं। सो अब हमें कहीं कबाब में हड्डी बनने की जरूरत नहीं है।"

"मेघ जी वो फिल्मी गीत आपने सुना नहीं- बादल का टुकड़ा एक चला झूमते,चाँद भी छुप गया उसके आगोश में।। तो कहीं ऐसे ही किसी मिशन पर किसी के छुपने-छुपाने के चक्कर में तो आप नहीं निकल पड़े हैं?"

"ये फिल्म वाले हैं जो चाँद और बादल का प्रेम कराते फिरते हैं। ठंड के मौसम में तो मेढक-मेढकी भी नहीं पूछते हमें। फिर मियाँ इस समय तो दिन है रात नहीं। चाँद अभी कहाँ मिलेगा, सूरज के पास गए तो कंबख्त हमें सुखा ही डालेगा ! "

"तो फिर कहाँ निकल पडे ? क्या किसी गाँव के बाहर बरस कर किसी की पीड़ा को हरा-भरा करने वाले हो, बकौल किसी शायर के- रोज उठते हैं यहाँ झूम के बादल पर सब के सब गाँव के बाहर ही बरस जाते हैं।"

"देखो भइया, हमको जहाँ बरसना होता है बरस जाते हैं । बिना भेदभाव के बरसते हैं कोई किसी धर्म का हो,किसी जाति का हो,गरीब हो या अमीर हो सबको भिगोते हैं। गाँव-शहर का भेद नहीं करते । हमें किसी से वोट थोड़े लेना है कि शहर-गाँव देखें।"

"तो देख क्या रहे हो बरस जाओ, यूँ ही उडते रहोगे तो कोई विरहन गाने लगेगी- आखिर साजन मिले भी हमसे तो ऐसे मिले कि हाय, सूखे खेत से बादल जैसे बिन बरसे उड़ जाय"

"किसान की खड़ी फसल नीचे देख रहे हो। अगर बरस जाऊँ तो किसान के साथ- साथ तुम भी मुझे गाली दोगे।"

"तो फिर क्या दूर क्षितिजस्थ बादलों के समूह ने आपको देशनिकाला दे दिया है जो आप अकेले-अकेले चले जा रहे हो ?"

"देशनिकाला हो देश के दुश्मनों का , मुँह से जरा शुभ-शुभ बोला करो ! "

"अरे आप तो कोई संघी भाई लगते हो। देश के दुश्मनों के देशनिकाले की बात करते हो!"

"क्यों देशभक्ति और राष्ट्रवाद पर किसी की बपौती है क्या? इसके बारे में और कोई नहीं बोल सकता?"

"मेघ सर जी इसके बारे में बोलना अब पाप समझा जाने लगा है। आप को तुरंत प्रतिक्रियावादी ,संघी, भाजपाई बता दिया जाएगा। अब तो देश के टुकड़े करने की बात करना,अलगाववादियों के समर्थन में नारे लगाना ही प्रगतिशीलता है, ऐसा करने को मिले यही बोलने की आजादी है। इसके समर्थन में हमारे बडे-बड़े नेता भी सड़क पर उतर आए है"

"इसी का उपाय करने जा रहा हूँ"

"आप तो बड़े देशभक्त निकले मेघजी, पर आप इसका उपाय कैसे करोगे। "

" देखो हम क्या कर सकते हैं, बस बरस ही तो सकते हैं। दिल्ली- हरियाणे जा रहा हूँ, वहाँ का माहौल बड़ा गरम है। राहुल गर्म हैं, केजरीवाल गर्म हैं, लेफ्टिस्ट गर्म हैं, राइटिस्ट भी गर्म हैं , संघी-भाजपाई गर्म हैं, जाट भाई भी गर्म हैं। खूब जमकर बरसूँगा, लोगों को ठंडा करूँगा, उनके दिलो दिमाग में ठंडक लाऊँगा ताकि लोग ठंडे दिमाग से देश की तरक्की के बारे में सोचें । जैसे हम बिना भेदभाव के हर तबके पर बरसते हैं, वैसे ही राजनीति छोड़ देश के हर वर्ग की प्रगति की बात हमारे राजनीतिज्ञ सोचें।"

" दशरथ माँझी की तरह आपने बड़ा कठिन काम ठान लिया है मेघ जी। मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं। बहुत दिनों के बाद वायुयान में विंडो सीट मिली थी । सो आपसे मुलाकात हो गई और आपने मेरे ज्ञानचक्षु खोल दिए। खैर मेरे विमान में सुरक्षापेटी बाँधने का संकेत कर दिया गया है क्योंकि गंतव्य स्थल आने वाला है। दिल्ली यात्रा के लिए आपको शुभकामनाएँ । चलिए फिर कभी ऐसे ही आते- जाते मुलाकात हो जाएगी। फिलहाल विदा लेते हैं !"

शनिवार, 20 फ़रवरी 2016

~ Left-Right Confusions in the Indian Politics~   


        Indian politics suddenly seems to have become a prisoner of Right- Left conflict. The divide is clear so it leaves no space for moderates. You have either to be a tolerant or intolerant, Pro Dalit or Anti Dalit, Pro Hindu or Anti Hindu, Secular or Communal, Pro Modi or Anti Modi. There are no chances for issue based support. Either you come to this side of fence or go to that side. No body cares that there has to be a balancing point between two extremes and only then there can be a proper balance which holds the democracy.

       For long left has been a regional force only in Indian politics and for sometime it seemed that sooner or later it would become marginal. Wheresoever Left has been strong Right has been a marginal force only. In the left dominated regional areas whenever Right made efforts to raise its head, Left had no qualms in crushing it even by violent means. Right also tried, though mostly in vain , to match violence by violence. Yet lately left has been having a downward slide which continues and next elections in Bengal and Kerala would decide whether the downward slide continues or could be averted for sometime.

       However Left has been able to hold its forte, despite of right's foray, among worker's unions and associations as well as such educational institutions where political debate has been a norm. To me the reason seems that while left is a natural choice for workers due to espousing of class struggle, for starry eyed romantic youth also it becomes a choice as a means of creating an equal world where all the oppressed are supposed to get an equal opportunity. As a student in my youth I went through a stage when left attracted me.

        Nearly thirty-thirty five years ago student youth wings of extreme left started making forays in the educational institutions and in many of these they were able to replace the traditional left. The traditional left never expressed anti India sentiments but the extreme left basically being anti establishment has no problem with being associated with activities which may be called anti Indian or anti national.Since the left found itself pushed to the corner by extreme left, to find the lost centre space at leftist bastions, it also started following tactics of extreme left. That is why we find a Kanhaiya of ASFI organizing a function for Afzal Guru and then caught in a nightmare as the programme is hijacked by extreme left as well as pro separatists. Extreme left considers separatists as a natural ally in its cause of throwing out a democratically elected government and establishing its own hegemony in the country.

        Rahul Gandhi's Political immaturity becomes pronounced as he joins the bandwagon of leftists in a conflict that is actually a Right- Left rivalary. This way he has given an opportunity to the right to dub him anti national and paint a right- left+extreme left +separatist conflict as a National- Anti National conflict. He has ceded the middle ground which was strong point of Congress for decades, to other parties. Many other opposition parties have also jumped the gun but basically being caste based parties they are not going to suffer as much in the process as much Congress . 

        Congress has decided to highlight Rohith Vemula issue along with J N U 's case to escape anti national tag and keep Dalit agenda on top.

        Here the question arises how Rohith Vemula remains a " Bharat Ma Ka Lal " (a la P M ) despite of organizing a function for Afzal Guru and how a Kanhaiya Lal becomes anti national for the same cause. Does being national and anti national can also be decided on the basis of caste and a concession can be given due to caste? Our national parties should answer this question.