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बुधवार, 26 जून 2013

आपदा के समय स्लैंगिंग के मैच न खेलो प्लीज! (व्यंग्य/Satire)

          हमारे दोनों मुख्य राष्ट्रीय दलों का यदि बस चले तो शायद वे स्लैंगिंग को हमारा राष्ट्रीय खेल बना  दें. वैसे तो सभी राजनीतिक दलों को इस  खेल में आनंद आता है.  उत्तराखंड में आई आपदा इनके लिए इस खेल के नए राउंड खेलने का अवसर लेकर आई है.सबसे पहले तो  किसी ने सवाल उठाया कि देश की सारी समस्याओं का हल जिनके पास है अर्थात नरेंद्र मोदी, वे कहाँ हैं. फिर किसी ने कहा कि गुजरात ने अमीर श्रेणी का राज्य होते हुए भी सिर्फ दो करोड रुपए ही क्यों दिए. स्पष्ट है कि सवाल सत्ताधारी पार्टी की तरफ से उठे थे.फिर जब नरेंद्र  मोदी उत्तराखंड में दिख गए तो प्रश्न उठ गया कि राहुल कहाँ हैं.यह प्रश्न मुख्य विपक्षी दल की तरफ से आया था.इसी बीच केदारनाथजी का "स्टेट आफ दि  आर्ट पुनर्निर्माण" करवा  दिए जाने का भी प्रस्ताव आ गया.किसी ने पंद्रह हजार गुजरातियों के बचाए जाने का भी दावा कर दिया. सत्ताधारी दल की काटो तो खून नहीं जैसी हालत हो गई.किसी ने सवाल किया कि मोदी को क्यों जाने दिया गया.अब ऐलान किया गया कि वी.आई.पी. ज्यादा से ज्यादा हवाई  चक्कर लगा कर चले जाएं, उतरने की इजाजत न होगी.किसी को भी अलग से राहत कार्य चलाने की इजाजत न होगी , जो सहायता देना हो उत्तराखंड सरकार को दें .उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने कहा कि मंदिर बनाने के  लिए उन्हे बाहरी सहायता की जरूरत नहीं है.मुख्य विपक्षी दल का कहना है कि जब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने मंदिर बनवाने के लिए कहा तो आपत्ति नहीं,अब हम कह रहे हैं तो इतनी आफत.इस बीच राहुल बाबा आ गए.मुख्य विपक्षी दल ने तुरंत आपत्ति जताई-जब वी आई पी को जाने की इजाजत नहीं है तो राहुल बाबा वहाँ कैसे पहुँच गए.सत्ताधारी दल का जवाब है कि तुम तो फोटो खिंचाने गए थे,वे सेवा करने गए हैं;तुम वी आई पी बन कर गए थे ,वे आम आदमी बनकर मदद करने  गए हैं.मुख्य विपक्षी दल चिल्ला रहा है-फाउल-फाउल!पर गनीमत है कि इस खेल में  कोई रेफरी या अंपायर नहीं है.वरना दोनों तरफ से उसकी टांगें खींची जातीं  और शायद बेचारा खडा भी नहीं रह पाता.

          इस आपदा के समय तो शर्म करो भाई! जिनके स्वजन लापता हो गए हैं या काल के गाल में समा गए हैं   उनकी सोचो.ऐसे लोगों की संख्या सैकडों में नहीं,हजारों में है.अपने इस  खेल को कुछ दिनों  के लिए मुल्तवी  कर अगर वास्तव में देशप्रेम  है तो आपदा  से पीडित जनता की शांतिपूर्वक मदद करो.अगर वह भी नहीं कर सकते हो तो कम से कम चुपचाप रहो  और जले पर नमक छिडकने जैसा काम न करो. कुछ दिनों के बाद फिर चौके-छक्के मार लेना.अभी तो धोनी चैंपियंस ट्राफी ले आए हैं और वही काफी है. जनता को कुछ दिनों के लिए बख्श दो प्लीज!

गंगा- पौराणिक आख्यान आज के संदर्भ में

          कहते हैं कि ब्रह्माजी के आदेश पर  गंगा सगर के पुत्रों को मुक्ति देने के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं. पर यह आज्ञा उन्हें अपमानजनक लगी ,इसलिए उनका   अवतरण क्रोधपूर्ण था जो पृथ्वी  पर प्रलय की सृष्टि कर देने के लिए  वेग और प्रवाह से परिपूर्ण था .  महादेवजी ने, जो केदारनाथ ही हैं, भगीरथ की प्रार्थना पर गंगा के क्रुद्ध प्रवाह को  अपनी हिमालयी जटाओं में झेल लिया और पृथ्वी की रक्षा हो सकी.महादेव की जटाओं से गंगा की जो धारा निकली वह शीतल होकर मोक्षदायिनी और जीवनदायिनी बन गई थी जो  भगीरथ सदृश मानव का अनुसरण करते हुए उनके पुरखों को तारने के लिए पाताललोक की ओर चल पडी तथा भागीरथी कहलाईं .उनकी धारा  साधारण मानवों को मोक्ष प्रदान करने के लिए पृथ्वी पर रह गई .पश्चिमी जगत में प्रचलित पुरा कथाओं में जिक्र मिलता है कि ईडेन के बगीचे से एक शक्तिशाली नदी पृथ्वी पर  गिरती है जो गंगा संबंधी भारतीय पौराणिक  आख्यान के अनुकूल ही है. अलकनंदा, मंदाकिनी और यमुना इसी गंगा की धाराएं और नाम हैं. उत्तराखंड के चारधामों में हाल में घटित भीषण वृष्टि और जल आप्लवन,भूस्खलन तथा जन-धन की अपार हानि को देखते  हुए लगता है कि हमने गंगा-आख्यान के प्रतीकात्मक अर्थों को समझने की कभी चेष्टा नहीं की.

          पौराणिक आख्यानों में सर्वत्र गंगा को मानवीकृत करते समय उन्हें  स्वच्छंद पर दूसरों की फिक्र करने वाली देवी-नारी के  रूप में चित्रित किया गया है.ब्रह्माजी के दरबार में जब  वे आती हैं तो उनकी भाव-भंगिमाएं किसी अल्हड नवयुवती सी हैं जिसे अपने कपडों-लत्तों की भी ठीक से सुध नहीं है जिसके  कारण  वहाँ उपस्थित इक्ष्वाकुवंशीय राजा महाभिष उनकी तरफ आकृष्ट हो जाते हैं.परिणामस्वरूप शापित होकर महाभिष को पृथ्वी पर राजा प्रतीप के पुत्र शांतनु के रूप में जन्म लेना पडता है.पर दूसरी तरफ जब वशिष्ठ द्वारा पृथ्वी पर मनुष्य के रूप में जन्म लेने के लिए शापित  विकृतरूप  वसुओं ने गंगा से पृथ्वी पर नारी रूप में उनकी माँ बन कर उनका उद्धार करने के लिए और स्वयं के जन्म लेने के शीघ्र बाद अपने प्रवाह में बहाकर मृत्युलोक से मुक्त कर  देने की प्रार्थना की  तो वे सहमत हो जाती हैं.

           पृथ्वी पर जब गंगा नारी रूप में आती हैं तो राजा प्रतीप की ही ओर आकृष्ट हो जाती हैं.प्रतीप अपनी दाहिनी  जांघ पर बैठ जाने के कारण उन्हें पुत्री सम मानकर  पुत्रवधू  बनाने के लिए ही तैयार होते हैं.पर गंगा उसी समय प्रतीप को अपनी शर्त बता देती हैं कि वे उनके पुत्र के साथ तब तक  ही रहेंगी जब तक कि वह उनकी इच्छा के अनुरूप आचरण करेगा.कालांतर में राजा  प्रतीप के पुत्र शांतनु जब गंगा के समक्ष प्रणय प्रस्ताव रखते हैं तो गंगा उन्हे बता देती हैं कि उन्हें उनकी स्वतंत्रता को बाधित करने का कोई अधिकार न रहेगा और न ही वे उन्हे अप्रिय संबोधन के साथ बुला सकेंगे और यदि कभी भी उन्हें लगा कि राजा ने  इसके विपरीत आचरण किया है तो वे अपने चुने हुए मार्ग पर जाने के लिए स्वतंत्र होंगी.राजा द्वारा शर्तें स्वीकार कर लेने पर गंगा शांतनु की हो  जाती हैं.सभी वसु एक-एक कर पुत्र रूप में गंगा और शांतनु के घर जन्म लेते हैं और गंगा उनसे किए गए वायदे के अनुरूप एक-एक कर उन्हें अपने प्रवाह में बहाती  जाती  हैं.राजा शांतनु अपने पुत्रों  को एक-एक  कर बिछडते देखते हैं पर गंगा द्वारा दाम्पत्य जीवन के  लिए लगाई गई शर्तों को याद कर चुप रहते हैं. गंगा जब आठवें पुत्र  के जन्म  के बाद उसे गोद में उठाती हैं तो इस बार शांतनु चुप नहीं रह पाते और गंगा की गतिविधि पर रोष प्रकट करते हैं.इस पर गंगा राजा को पुत्र सौंप देती हैं और उनके प्रणय निवेदन के समय स्वयं द्वारा रखी गई शर्त का स्मरण कराती हैं तथा कहती हैं कि उनके साथ का अंत हुआ और वे अब जा रही हैं.

          पर गंगा निष्ठुर नहीं  हैं.पत्नी के वियोग में राजा शांतनु जब राज-पाट त्याग कर गंगा के ही किनारे तप करने चले  जाते हैं तो  वे आकर पुत्र देवदत्त को साथ ले जाती हैं  तथा पहले उन्हें ब्रह्मर्षि वशिष्ठ  को शास्त्रों का ज्ञान अर्जित करने के लिए सौंपती हैं एवं उनमें पारंगत हो जाने के बाद उन्हें परशुराम को शस्त्र विद्या में निष्णात बनाने के  लिए  सौंप  देती हैं. बालक देवदत्त के नीति,धर्म,शस्त्र और शास्त्रों का मर्मज्ञ नवयुवक बन जाने  के बाद शांतनु के निवेदन पर उन्होने पुत्र को उनके समक्ष प्रस्तुत किया तथा साथ ही राजा से अनुरोध किया कि वे तप करना छोड   पुत्र को साथ लेकर अपने राज्य वापस  चले जाएं .राजा ने ऐसा ही  किया.यह राजकुमार देवदत्त ही महाभारत के गंगापुत्र भीष्म  हैं.

          इस पौराणिक आख्यान में गंगा  स्वतंत्रताप्रिय, दूसरों के उपकार की भावना रखने वाली, नि:संकोच अपनी भावना-प्रेम-प्रणय को व्यक्त कर देने वाली,कुछ हद तक क्रोधी और रुष्ट हो जाने वाली परंतु जिम्मेदारी का भाव रखने वाली देवी-नारी के रूप में मानवीकृत होकर हमारे सामने आती हैं.  वे किसी भी आधुनिक नारी के लिए आदर्श हो सकती  हैं.पर हमने उनके इस चरित्र   को समझ कर उसके अनुरूप व्यवहार करने का प्रयास नहीं किया जिसके परिणाम हमारे सामने आने आरंभ हो गए हैं.

         क्या कारण है कि गंगा और उनकी धाराएं   उत्तराखंड में रूद्र के झंझावात के बाद मूल प्रलयंकारी रौद्र रूप में वापस आ गईं और फिर केदारनाथजी भी उन्हे अपनी जटाओं में संभाल नहीं पाए? पिछले  दिनों इस पर काफी कुछ लिखा गया है . हिमालय ही तो शिवजी की जटाओं का प्रतिरूप है जिसने गंगा को संभाल रखा है. वृक्षों और वनस्पतियों का दोहन कर शिवजी को हम जटाहीन करने में लगे हुए हैं.निर्माणकार्य के लिए हम नि:संकोच डायनामाइट का प्रयोग कर रहे हैं और जटा  की कौन कहे,हम तो शिवजी के सर को  ही अस्थिर करने में लगे हुए हैं. फिर गंगा को संभालेगा कौन यह हमने कभी सोचा नहीं. हमारी ऊर्जा की भूख और हमारा लालच इतना बढ गया कि गंगा के अलौकिक रूप की हमने  परवाह न कर स्वतंत्रताप्रिय गंगा को जिन्हे हम माँ कहते हैं, जगह-जगह बंधनों में आबद्ध करना आरंभ कर दिया . यहाँ तक कि   मैदानों में गंगा में पानी ही  नहीं रह गया,जो पानी दिखाई देता है वह कचरे के साथ आया हुआ जल है.कुंभ मेले के लिए इसी कारण बाँधों से जल छोडे जाने की विशेष व्यवस्था करनी पडी.  व्यवसाई बनकर हमने सारे रिश्ते भुला दिए हैं और पैसे के लोभ में केदारनाथजी तथा बद्रीनाथजी सबको पर्यटनस्थल में तब्दील  कर इतने बोझ से लाद दिया है और इतना मलिन कर दिया है कि वे गंगा के रोष से अपने भक्तों को  नहीं बचा सके या फिर बचाना उन्होने मुनासिब नहीं समझा.वे तो बस शांतनु की तरह हृदय में वेदना समेटे सारा दृश्य देखते रहे. कुछ वर्षों पूर्व मैंने अपने एक मित्र को दिल्ली फोन कर जब केदारनाथ जाने की इच्छा व्यक्त की तो उसने कहा कि कपाट खुलने के बाद एक सप्ताह के भीतर आ जाओ,बाद में बहुत अधिक गंदगी हो जाएगी जो बरसात हो जाने के बाद ही साफ हो सकेगी.  गंगा अनुशासनप्रिय माँ हैं जो  बच्चों की देख-रेख जिम्मेदारी से करती हैं पर यदि गलती हो गई तो दंडित भी करती हैं.

          पुराण यह भी वर्णित करते हैं  कि गंगा के सूख जाने के साथ ही कलियुग समाप्त हो जाएगा.ऐसे में सहज  मन में यह प्रश्न उभर आना स्वाभाविक है कि क्या हम  उसी राह पर चल पडे हैं.पुराण भले ही विशुद्ध वास्तविकता का लेखा -जोखा न हों पर उनमें प्रतीकात्मक निहितार्थ जरूर छिपे हुए हैं जिन्हें यदि हम समझ सकें तो हमारे लिए बेहतर  होगा.

सोमवार, 17 जून 2013

असली समाजवाद! (व्यंग्य/Satire)

           जुम्मन शेख मेरे पुराने  साथी हैं.उनका एक उसूल है कि अगर कोई तुम्हारा ख्याल करे तो  तुम उसका ख्याल जरूर करो,अगर कोई तुम्हारे ऊपर अहसान करे तो तुम उसके इस अहसान का बदला चुकाने का मौका मत छोडो.  वो बताते हैं कि उन्हें यह बात उनके अब्बूजान ने बताई थी जो खुद भी इस  उसूल पर चलते थे. उनके कुनबे के लोग  आजादी के पहले से कंकडबाग, पटना में रहते आए थे. आजादी मिलने के बाद जुम्मन  के चाचा-ताऊ सब पाकिस्तान  चले गए पर जुम्मन  के अब्बूजान ने हिंदुस्तान नहीं छोडा क्योंकि उन्हें पंडित जवाहरलाल नेहरू के इस वायदे पर भरोसा था कि  आजाद हिंदुस्तान में  हिंदू और मुसलमान दोनों का दरजा बराबरी का होगा.आजादी के बाद सालोंसाल जुम्मन  के अब्बूजान उस वायदे का ख्याल करके कांग्रेस को वोट देते रहे .सन सरसठ में भी उन्होने कांग्रेस का दामन नहीं छोडा  जब पहली बार उनकी बिरादरी के कुछ लोगों ने बढती मंहगाई से तंग आकर  कांग्रेस के खिलाफ वोट डाला. जयप्रकाश  नारायण का जब आंदोलन चला तो जुम्मन के अब्बू ने कहा- कुछ भी होता रहे हमारा वोट तो इंदिरा को ही मिलेगा,आखिर वो जवाहरलाल की बेटी है.पर जुम्मन के अब्बू अपनी इस बात पर कायम नहीं रह पाए क्योंकि इमरजेंसी लगने के बाद जुम्मन के मामू जो कालेज में पढाते थे और दो बेटों तथा दो बेटियों, कुल चार संतानों के भरे-पूरे परिवार के मालिक थे पकड कर जेल  में बंद कर दिए गए.वजह ये थी कि उन्होने जबर्दस्ती बंध्याकरण आपरेशन किए जाने के विरोध में बयान दिया  था और उन्हे जेल से तब छोडा गया जब उन्होने खुद का बंध्याकरण  आपरेशन करा लिया.तब से ही जुम्मन के अब्बू को  लगने लगा कि कहीं ढलती उम्र के बावजूद बंध्याकरण आपरेशन के लिए उनका  भी नंबर न  लगा दिया जाए जबकि  वो डरपोक इतने  थे कि एक बार फोडा हो जाने पर जब डाक्टर ने उसका आपरेशन  करने के लिए कहा तो उन्होने चीर-फाड के डर के मारे साफ इंकार कर दिया था,भले ही बाद में पस पड जाने के कारण वे उसकी तकलीफ को महीने भर झेलते रहे और ऐंटीबॉयटिक इंजेक्शन लगवाते  रहे.इसलिए इमरजेंसी के बाद जब वोट पडे  तो उन्होने उन्ही जयप्रकाश नारायण के अनुयाइयों को  वोट दिया जिन्हे वे पहले बच्चों की पढाई-लिखाई बरबाद करने के लिए कोसते थे.पर जनता सरकार के समय में जो दंगे-फसाद और अराजकता के दर्शन हुए कि उन्होने फिर इन्हे वोट देने से तोबा  कर ली और सन अस्सी में फिर इंदिरा गाँधी को वोट दिया.इंदिरा के बाद उन्होने राजीव के लिए वोट दिया .पर उनका एक बार  फिर राजीव  की तरफ से दिल टूटा जब रामजन्मभूमि का शिलान्यास हुआ.पर इसके पहले कि 1989 में वोटिंग हो, वो बीमार  पडे और  उनका इंतकाल हो गया.इंतकाल के पहले उन्होने जुम्मन को पास बुलाया और बोले बेटा मेरे बाद मेरे उसूल ही मेरी धरोहर हैं ,तुम उन्हे निभाते रहना.अब तक जुम्मन इक्कीस के हो चुके थे और उनका नाम  भी वोटर लिस्ट में आ गया था.जुम्मन को अब्बाजान के दर्द का और उनकी कही बातों का ध्यान था.इसलिए उन्होने अपना वोट जनता पार्टी को दिया.लालूजी बिहार के  मुख्यमंत्री बने.लालूजी ने सदैव मुस्लिम भावनाओं का ध्यान रखा.इसलिए जुम्मन   उनको ही वोट देते रहे.पर जब अराजकता बहुत बढ गई और अपने आस-पास घटित हो रही घटनाओं  को देखकर जुम्मन को अपने जान-माल की सुरक्षा  का भय सताने लगा तो उन्होने  2004 में वो कर डाला जो उनके खानदान में किसी ने नहीं किया था.उन्होने उन्ही आडवाणी  की पार्टी के लिए वोट डाला जिन्हे लालूजी ने 1989 में तब गिरफ्तार कर लिया था जब वो अयोध्या में राममंदिर  बनवाने के लिए एक रथ पर सवार होकर उनके राज्य में घुसे थे  और ये खबर पाकर बीमारी के कारण खटिया पकड चुके उनके अब्बजान खुश हुए थे.दरअसल  वजह यह थी कि  जनता दल(यू) और बी जे  पी के गठजोड ने नितीश की पेशकश मुख्यमंत्री के तौर पर की थी , इसलिए जुम्मन को भरोसा था कि गुजरात जैसा कुछ बिहार में नहीं होगा और फिर अगर ऐसा कुछ होता भी है तो  अगले इलेक्शन में लालू के लिए  वोट देने से उन्हे कौन रोक सकता था.पर अगले इलेक्शन में उन्हे लालू को वोट देने की जरूरत नही पडी क्योंकि ऐसा कुछ हुआ नहीं और जुम्मन का जो भरोसा अपनी जान-माल की हिफाजत पर से उठ गया था वो वापस लौट आया था.

          पर आज थोडी देर पहले जुम्मन का फोन मेरे पास आया था.जुम्मन कह रहे थे -" समझ में नही आ रहा है क्या करूँ.कांग्रेस  का कहना  है कि मोदी रूपी राहु-केतु के प्रकोप से  वही मुसलमानों को बचा सकती है,लालू का कहना है कि असली जवाँ-मर्द मैं ही हूँ,आखिर आडवानी की  गिरफ्तारी का दम मेरे अलावा और किसमें था  और अब नितीश का कहना है कि  मुसलमानों के लिए सबसे बडी कुर्बानी तो मैंने दी है,बहुमत वाली सरकार से अल्पमत वाली सरकार का मुख्यमंत्री बन गया  हूँ."

          मैंने कहा-"जुम्मन भाई जो आग पटना में लगी है वही लखनऊ में भी लगी हुई है.कांग्रेस कह रही है कि ब्राह्मणों की असली पुरानी पार्टी वही है.बी जे पी का कहना है  कि धर्म की रक्षा का जिम्मा उसका है और ब्राह्मणों को धर्म की रक्षा के लिए उसके ही साथ रहना चाहिए.माया बहन कह रही हैं कि जब सब ब्राह्मणों की मान- मर्यादा का हनन कराने में लगे थे तो उन्होने ही ब्राह्मणों को उनकी प्रतिष्ठा वापस दिलवाई और मुलायम भैया ब्राह्मणों का यशोगान करते हुए कह रहे हैं कि  ब्राह्मणों ने सदैव देश का  उद्धार किया  है और फिर देश को बचाने के लिए उनके साथ आएं.यही असली समाजवाद है जुम्मन भाई,जब हर पार्टी के लिए हर धर्म और  जाति बराबर महत्वपूर्ण हो जाए!भगत सिंह,पं.जवाहरलाल  और लोहिया सभी ने इसी समाजवाद की  कल्पना की रही होगी!उसूलों की ज्यादा फिक्र न करो और अगर उसूलों की ज्यादा फिक्र है  तो ऐसा करो  कि इलेक्शन में तुम मेरे खिलाफ खडे हो जाओ और मैं तुम्हारे खिलाफ खडा हो जाता हूँ .तुम मेरे लिए वोट डाल देना  और मैं तुम्हारे लिए वोट डाल दूँगा.तुमने मेरे ऊपर जो अहसान किया होगा वह चुकता हो जाएगा और मैंने तुम्हारे ऊपर जो अहसान  किया होगा वह सब चुकता हो जाएगा और उसूलों का पालन करने के कारण हमारे पितरों की आत्माएं भी प्रसन्न हो जाएंगी."

रविवार, 9 जून 2013

संघ खेमे की राजनीति एक नए मुकाम पर!

        भारतीय राजनीति में संप्रदाय की अपेक्षा जाति की भूमिका कहीं अधिक प्रभावी रही है.जाति के आधार पर राजनीतिज्ञ रणनीति बनाते रहे और वोट माँगते रहे हैं. आज जब पिछडी जाति से संबंध रखने वाले नरेंद्र मोदी को भारतीय जनता पार्टी (बी .जे.पी.) में नं 1 के रूप में प्रतिष्ठित करने की कवायद चल रही है तो बहुत पहले की एक घटना याद आ रही है.चौधरी चरण सिंह ने जब 1967 में कांग्रेस को अलविदा कहने का निश्चय किया तो श्री बलराज मधोक ने उन्हे बी जे पी  के पूर्व संस्करण भारतीय जनसंघ को ज्वाइन करने के लिए मनाने की बहुत कोशिश की पर चौधरी साहब  का कहना था कि संघ और जनसंघ दोनों में ही शीर्षस्थल पर पहुँचने के लिए ब्राह्मण होना जरूरी है और इस आधार पर वे भारतीय जनसंघ में शामिल होने के लिए सहमत नहीं हुए .बलराज मधोक ने चौधरी साहब को लाख आश्वस्त करने का प्रयास किया कि जनसंघ में उन्हे पूरा मान-सम्मान दिया जाएगा पर चौधरी साहब अपनी बात पर अडिग रहे.

       आज जब भारतीय जनता पार्टी के कुछ बुजुर्ग नेताओं ,उनके अनुयाइयों और मध्य वय के कुछ नेताओं/नेत्रियों (जिन्हे मोदी अपना स्थान छीनते हुए दिख रहे हैं ) के समूह को छोड कर पूरी भारतीय जनता पार्टी मोदी को वोट-कमाऊ राजनीतिज्ञ मानते हुए उनके सहारे चुनाव की वैतरणी को पार करने की आशा में है तो चौधरी साहब के विचारों के परिप्रेक्ष्य में भारतीय राजनीति और साथ ही संघ खेमे की राजनीति एक नए मुकाम तक पहुँच गई दिख रही है. अटल बिहारी बाजपेयी और आडवाणीजी के बाद  अगली पीढी के नेताओं में भावी प्रधानमंत्री के रूप में देखे जा रहे प्रमोद महाजन के असामयिक निधन के बाद अरूण जेटली और सुषमा स्वराज को प्रमोट करने की कोशिशें की गईं. पर यह दोनों ही जनहृदयों के नायक/नेत्री के रूप में बाजपेयी या आडवाणी के कद के कहीं नजदीक भी नही पहुँच सके हैं.आडवाणीजी  अभी भी भारतीय राजनीति में सक्रिय हैं पर पिछले चुनाव में "मजबूत नेता मजबूत पार्टी" के नारे को जनता ने तवज्जो नहीं दी और उनका आभामंडल तिरोहित हो गया है. कुशल प्रशासक के रूप में शिवराज सिंह चौहान का नाम भी आगे करने की कोशिश की गई पर वे मोदी जैसे शातिर राजनीतिज्ञ नही हैं और कार्पोरेट जगत तथा मीडिया पहले से मोदी को विकल्प के तौर पर प्रचारित कर रहा है.यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि मोदी के विकल्प के रूप में बी. जे. पी. में शिवराज का नाम आगे लाया गया और वे भी पिछडे वर्ग से ही हैं.ले देकर भारतीय जनता पार्टी को मोदी के अलावा और कोई नहीं दिख रहा जिसके नाम पर वोट मिल सकें.

        मोदी ने मुख्यमंत्री के रूप में अपने शासन के दौरान एक ऐसी छवि बनाई कि गुजरात में बी.जे.पी.के सभी दिग्गजों की छुट्टी हो गई.मोदी ने जो चाहा उसे कार्यान्वित किया और जो भी रास्ते में आया उसे किनारे लगा दिया ,वह चाहे भारतीय किसान संघ रहा हो या फिर प्रवीणभाई तोगडिया रहे हों.हिंदुत्व के पोस्टर-ब्वाय के रूप में प्रचारित किए जा रहे मोदी ने रास्तों पर बनाए गए दो सौ मंदिरों को भी स्थानांतरित करने में किसी की परवाह नहीं की.मोदी की इंदिरा गाँधी जैसी व्यक्तिवादी राजनीति की शैली जिसमें लोग उनकी सभाओं में उनका मुखौटा लगाए दिखाई देते हैं उनके राजनीतिक विरोधियों की तो बात ही छोड दीजिए; बी,जे.पी. के कुछ वरिष्ठ नेताओं के साथ-साथ संघ को भी रास नहीं आती.फिर भी अन्य किसी करिश्माई व्यक्तित्व के अभाव में संघ और बी जे पी दोनों की ही मजबूरी मोदी हैं.भ्रष्टाचार में डूबे राजनीतिज्ञों और नौकरशाही वाले इस देश की जनता का एक वर्ग  सलीम-जावेद लिखित फिल्मों के अमिताभ बच्चन जैसे ऐंग्री यंगमैन की तलाश में है जो व्यवस्था को दुरुस्त कर दे ,भले ही उसमें अधिनायकवाद के तत्व हों.पहले भी तो वह इंदिरा गाँधी को सर-आँखों पर बिठा चुका है.

        मोदी का यह उभार राजनीति के पूर्व जजमानी सिस्टम जिसमें अगडों या ब्राह्मणों के हाथ में सत्ता रहती थी और शेष जातियाँ जजमान के तौर पर उनके संरक्षण में रहती थीं,के राष्ट्रीय राजनीति से भी विदाई का संकेत दे रही है.प्रदेशों की राजनीति से तो यह पद्धति काफी पहले विदा हो चुकी है. अगर आज चौधरी चरण सिंह होते तो उनकी इस डेवलपमेंट पर क्या प्रतिक्रिया होती,सोचने लायक है.

मंगलवार, 28 मई 2013

इज्जत का फालूदा बना तो क्या कुर्सी तो सलामत रहे!

          देश के तमाम लोग कह रहे हैं कि एन.  श्रीनिवासन साहब  बी. सी. सी. आई. के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दें. पर आखिर क्यों ? जमाई के  द्वारा किया गया पाप श्वसुर के सर क्यों मढ रहे हैं आप लोग ? जमाई तो सदियों से श्वसुर  की लुटिया  डुबोते आए  हैं. सबसे पहले तो  प्राचीनकाल में "स्यामंतक"  हीरे की खोज में निकले हमारे भगवान श्रीकृष्ण ने जाम्बवान को मुष्टियों के प्रहार से अधमरा कर दिया फिर  उनकी सुपुत्री जाम्बवती को अपनी अर्धांगिनी बनाने के  लिए भी  सहमति  प्रदान कर दी.  कालांतर में  पृथ्वीराज चौहान  दिनदहाडे   शेष भारत के राजाओं के सामने  इस बात को नजरअंदाज करते हुए कि जयचंद उनका मौसेरा  भाई था और इस  नाते संयोगिता रिश्ते में उनकी भतीजी ही थी, संयोगिता को  घोडे पर बिठाकर भगा ले गए;  भले ही देश के हक में उनकी इस हरकत का अंजाम बुरा हुआ. आधुनिक इतिहास के आरंभिक दौर में  मीर कासिम ने मीरजाफर को बंगाल की नवाबी से बेदखल करवा कर  गद्दी कब्जियाई  और ज्यादा  पीछे न जाएं तो यही कोई बीस-इक्कीस साल पहले चंद्राबाबू नायडू ने एन.टी  रामाराव का तख्तापलट कर खुद मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल ली. अगर भगवान  श्रीकृष्ण को छोड दें जिन्होने खुल्लमखुल्ला जाम्बवान को चैलेंज किया था (आखिर वो तो भगवान थे न), तो  बाकी सबने श्वसुरों को इस बात का कोई इमकान न होने दिया कि वे  पलीता लगाने वाले हैं  और जब आतिशबाजी शुरू हुई तो पहले तो उन्हें(श्वसुरजन को ) यह  समझ में ही नहीं आया कि कि उसका कर्ता-धर्ता कौन है. तो कुल कहने का आशय यह है साहब, कि ये सोलह आने संभव है कि बेटे समान प्रिय दामाद क्या कर रहा है इसका कुछ भी भान श्रीनिवासनजी  को न रहा हो. आप कहते हैं कि कोडाइकोनाल  में दो दिन पहले तक तो दोनो साथ-साथ थे  और आनंद मना रहे  थे. तो आप कहते रहिए साहब!अब आप क्या उम्मीद करते हैं कि पृथ्वीराज, मीर  कासिम   और चंद्राबाबू की श्रेणी  का दामाद  अपने तुरुप के पत्ते श्वसुरजी को   दिखाकर कहेगा-" पिताजी देखिए ,अगली चाल  में मैं  इसे डालने वाला हूँ."  तो साहब आप  श्रीनिवासन साहब की इस बात  पर पूरा भरोसा रखिए कि वह दामाद जिसे उन्होने विवादों से बचने के  लिए चेन्नई सुपर किंग के मालिक के रूप में प्रचारित करवा रखा था, लाखों-करोडों रूपए आई पी एल की बेटिंग पर लगा रहा था,फिक्सिंग कर रहा था पर उन्हें कुछ भी मालूम  नहीं था. जब बंसल साहब का भांजा करोडों का लेन-देन कर  रहा था  और बंसल साहब को  कुछ भी मालूम नहीं था  तो यह कोई अजूबे की  बात नहीं कि श्रीनिवासन साहब को कुछ भी मालूम नहीं  था. अब इस देश में यही हो  रहा है , माँ-बाप  और सास-श्वसुर की पूरी एक जमात धृतराष्ट्र बन चुकी है. उनके बेटे, दामाद, भतीजे और भांजे उनकी नाक के नीचे क्या कर रहे हैं उन्हे मालूम  नहीं रहता.मांएं कहती हैं -उनका बेटा भोला भाला है,वो कोई गलत काम कर ही नहीं सकता. न यकीन हो तो पिछले छ: महीनों मे चर्चित बलात्कार के मामलों में सारे आरोपियों की मांओं के बयान पढ लीजिए. तो साहब मैं बार-बार कहता हूँ कि श्रीनिवासन साहब को यह बिलकुल मालूम नही था कि उनका दामाद  क्या कर रहा है.

          फिर मेरियप्पन का कहना है कि उसे दारापुत्र विंदू ने बहकाया है.बच्चा है बेचारा, आ गया बहकावे में! श्रीनिवासन साहब का कहना है कि मेरियप्पन क्रिकेट एंथूसिएस्ट है. इतना भी आप लोग नहीं समझते. वह तो अपने एंथूसियाज्म में महज कौतूहलवश चेन्नई सुपर किंग की  टीम के  साथ-साथ घूम  रहा   था. अब अगर लोग उसे चेन्नई सुपर किंग का   मालिक समझने लगे ,राजीव शुक्ला उसे यही मान कर  ई-मेल भेजने  लगे तो इसमें न तो श्रीनिवासन की कोई गलती है और न ही मेरियप्पन की .

          आप कहते हैं कि अगर श्रीनिवासन साहब को दामाद  की  करतूतों के बारे में नहीं भी मालूम था तो भी वह नैतिक आधार पर इस्तीफा दे दें. आखिर क्यों दें भाई? कौन है इस देश में जो नैतिक आधार पर इस्तीफा दे  रहा है? लालबहादुर शास्त्री की बात करते हो,अरे वो जमाना चला गया भाई! क्यों पुरानी बातों को कलेजे से चिपकाए बैठे हो? भूल जाओ नैतिकता-फैतिकता! अब तो जब तक कुर्सी पर से धकियाया नहीं जाता या हाथ पकड कर ऐंठा  नहीं जाता तब तक कोई कुर्सी नही छोडता. फिर श्रीनिवासन साहब  ही आपको मिले हैं नैतिकता का पाठ पढाने  के लिए. जब इस आई. पी. एल. का आगाज ही नीलामी के साथ होता है  जिसमें खिलाडियों पर बोली लगती है और जिसे पहली बार देख कर एक नीलाम हो रहे विदेशी खिलाडी ने कहा था-"आई वाज फीलिंग लाइक ए काऊ",तो किस  नैतिकता की बात आप करते हैं? आई.पी.एल. की  सफलता के पीछे मार्केटिंग के सारे नुस्खे हैं. मार्केटिंग का मूलमंत्र है- पैसा लगाओ और पैसा कमाओ ,उसके लिए जो भी हथकंडा जरूरी  हो अपनाओ :फनफेयर ,चीयरलीडर और पार्टियाँ ,ये सब वही तो हथकंडे थे. आई. पी. एल. तो एक बिकाऊ माल है,खाली स्पोर्ट्स-स्पोर्ट्स आप क्या लगाए बैठे हो? श्रीनिवासन साहब  का कहना है -"आई कांट बी बुलडोज्ड इन टू   रिजाइनिंग". तो आप लोगों को ये मालूम नहीं है कि श्रीनिवासन साहब खुद बुलडोजर हैं. आपकी क्या औकात कि उन्हें बुलडोज करें. ये उनकी ही हैसियत थी  कि उन्होंने ये कानून ही बदलवा दिया था कि बी. सी. सी. आई. के पदाधिकारी आई. पी. एल. टीमों के मालिक नहीं बन सकते. तो  साहब  वे अपनी मनमर्जी करते हैं और ये उनकी आदत में शुमार है. बी. सी. सी. आई. के किसी सदस्य या पदाधिकारी की हिम्मत उनके आगे चूँ करने की नहीं है. उसे उन्होंने कौरवों की सभा में तब्दील कर दिया है जहाँ बडे-बडे दिग्गज बैठे हैं पर सारी नैतिकता भूल कर चुपचाप  बैठे हैं. वे राजनीतिक सूरमा भी जो बात-बात पर प्रतिद्वंदी दल के लोगों  से इस्तीफे की माँग  करते हैं.

          श्रीनिवासन साहब का कहना है कि कानून अपना काम करेगा और दोषियों को सजा मिलेगी. तो आप  उन पर भरोसा रखिए भले ही उनके दामाद  के बारे में आने  वाली रिपोर्ट  और उनकी आई. पी. एल. टीम (दुनिया जानती है कि चेन्नई सुपर किंग  किसकी टीम है) के  बारे  में उन्हें खुद ही फैसला करना है. आप उनकी नीयत पर खामखाँ शक मत करिए. उन्हें शेरशाह सूरी की श्रेणी का मानिए जिसने अपने बेटे द्वारा किसी की पत्नी के ऊपर थूक दिए जाने पर उसके लिए भी  इसी तरह के  बर्ताव का प्रावधान किया था. भले ही आज के भारत में इस तरह के सारे आश्वासन झूठे साबित हो रहे हों पर आप जगजीत सिंह की गाई गजल के मुताबिक झूठे वादे पर यकीन करके अपनी उम्र बढा लीजिए. आखिर आने वाले साल तक आप ये सारी बातें भूल चुके होंगे और   किसी न किसी आई. पी. एल.  टीम को  सपोर्ट कर उसकी जय-जयकार में लगे  होंगे.इस देश में तमाम सारे  गम हैं और क्रिकेट तथा आई पी एल का कांबीनेशन उन गमों को भुलाने की सबसे अच्छी दवा है.

शनिवार, 25 मई 2013

दुश्चक्र ( संस्मरण पर आधारित एक बाल श्रमिक की कथा)

        बात सन  1995  की है .मेरी तैनाती उन दिनों अंबरनाथ (जो मुंबई का पुणे लाइन पर स्थित उपनगर है) में थी.शुरू में मुझे सरकारी आवास नहीं मिल पाया और मैं किराए पर एक फ्लैट लेकर उसमें रहने  लगा. कुछ समय के बाद मुझे सरकारी आवास आबंटित हो गया और मैं उसमें रहने के लिए आ गया.मेरा आवास एक काफी  बडा भवन था जो एक छोटी पहाडी या वहाँ की स्थानीय  भाषा के अनुसार टेकरी के ऊपर स्थित था.इसमें चार फ्लैट नीचे तथा चार ऊपर बनाए गए थे.मैं  नीचे सामने  पश्चिम की दिशा में स्थित फ्लैट में रहता था. भवन से निकलने वाली सडक के बगल में उपत्यका थी तथा सामने भी हरी-भरी पहाडियाँ दिखती थीं  जो संपूर्ण दृश्य को मनोरम बनाती थीं.सुबह उनके पीछे से निकलने वाला सूरज मन को आहलादित  कर देता था. एक तरफ की पहाडी पर बस्ती थी और उस पर रात में  रोशनियाँ टिमटिमाती थीं जो अच्छा समा उपस्थित करती थीं. बारिश के दिनों में चारों तरफ का दृश्य स्वर्ग सदृश सुंदर हो जाता था. मेरे पास एक सर्वेंट  क्वार्टर तथा गैरेज भी था.चूँकि मेरे पास गाडी आदि  नही थी अत: गैरेज का इस्तेमाल भी सर्वेंट क्वार्टर की तरह होने लगा तथा उसमें एक परिवार रहने  लगा जो बागवानी का काम कर देता था.कुछ दिनों के बाद एक परिवार सर्वेंट क्वार्टर में रहने की मंशा से आया. मेरे पडोसी बोलन साहब ने बताया कि वे पहले उनके सर्वेंट क्वार्टर  में रह  चुके थे तथा भले  लोग थे.अत: मैंने अपना  सर्वेंट क्वार्टर उन्हे दे दिया.

        मेरे घर में शुरू में  काम करने के लिए उस घर की गृहस्वामिनी अपनी एक छोटी बच्ची के साथ आई.कुछ दिनों के बाद उसने स्वयं आना  बंद कर दिया और केवल उस बच्ची को ही भेजना आरंभ कर  दिया.बच्ची की उम्र दस -ग्यारह वर्ष रही होगी.पर वह बडी तत्परता के साथ घर के सारे काम निपटा देती.उसने पाठशाला का मुँह भी नही देखा था तथा वह अपनी माँ के साथ अन्य कई  घरों में भी काम करने के लिए जाती थी.उसका नाम पिंकी  था.बच्ची बडी ही सुघड,विनम्र तथा स्वच्छताप्रिय थी. ढंग के कपडे पहन  लेने पर  कोई कह नहीं सकता  था कि वह किसी समृद्ध परिवार की नहीं है.  मेरी श्रीमतीजी ने बी.एड. में प्रवेश लिया तो पिंकी रसोई के काम में भी उनकी मदद करने लगी.जरूरत पडने पर वह रोटी भी बना देती.अपने स्वभाव,सेवाभाव तथा कर्तव्यपरायणता से बच्ची ने हम लोगों के दिल में घर कर लिया.मैने अपनी पत्नी से कहा कि तुम पिंकी को कुछ पढना-लिखना सिखाओ.पिंकी को कापी तथा पेंसिल आदि लाकर दे दी गई तथा घर का काम करने के बाद वह मेरी श्रीमतीजी से पढने लगी.जब उन्होने उसे हिंदी पढाना शुरू किया तो पिंकी  कहने लगी कि  मै अंग्रेजी  पढूँगी. अब  वह हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी भी पढने लगी.कुछ दिनों तक तो पिंकी की पढाई ठीक-ठाक चली  फिर कभी उसकी कापी तो कभी पेंसिल गायब होने लगी. किसी दिन पिंकी न पढने के लिए कोई बहाना बना देती.एक समय के बाद मेरी श्रीमतीजी तंग आ गईं  और मुझसे बोलीं-पिंकी की पढने-लिखने में रुचि नही है,कभी कापी तो कभी  पेंसिल गायब कर देती है.धीरे-धीरे पिंकी की  पढाई बंद हो गई.

        एक दिवस रविवार था और मैं सुबह देर तक सोने के मूड में था .प्रात: दरवाजे की घंटी बजी .श्रीमतीजी संभवत: स्नानागार में थीं.अत: मुझे जाकर दरवाजा खोलना पडा.देखा तो पिंकी खडी थी .पिंकी घर के भीतर आ गई  और मैं पुन: सोने का उपक्रम करने लगा.तभी पिंकी मेरे पास आकर बोली-"अंकल-अंकल!"जब मैंने आँखें खोलीं तो पिंकी ने मेरी तरफ एक  सौ रूपए का नोट बढाया.मैं अचरज में पड गया और बोला-"ये क्या पिंकी?पिंकी हंस कर बोली-"अंकल,कडकी थी न घर में तब आंटी से ये रूपए लिए थे." मैंने रूपए ले लिए पर सोचने लगा -ये छोटी सी पिंकी अभी से कडकी जैसे शब्द से परिचित हो गई है.

        पिंकी हमारे परिवार का एक अनिवार्य हिस्सा सा बन गई थी.मेरे साले साहब अमेरिका से सपरिवार  मिलने आए  थे.वे पति-पत्नी दोनों ही व्यस्त प्रोफेशनल हैं.मेरी सलहज ने अमेरिका में दैनिक कामों में सहायता  के लिए  किसी के मिल पाने में होने वाली दिक्क्तों का जिक्र किया तो मैंने कहा -  आप पिंकी को स्पांसर कर  अपने साथ लेती जाइए. उन्होने मेरी श्रीमतीजी से  कहा-"पिंकी से पूछो  अमेरिका चलेगी?" जब श्रीमतीजी ने पूछा तो पिंकी ने मना कर दिया.दिन गुजरते गए और इस दौरान मुझे पुत्ररत्न की  प्राप्ति हुई .पिंकी बेटे की देख-भाल में भी सहायता करती.मेरा बेटा भी पिंकी  से हिल-मिल गया.जब उसने बोलना शुरू किया तो पिंकी को ताई (मराठी में दीदी को ताई  कहते हैं) कह कर पुकारना  शुरू कर दिया.पिंकी इस दौरान  बडी हो गई थी,इस  बात का अहसास उस दिन हुआ जब उसकी  माँ मेरे पास आकर बोली- "जब पिंकी काम करने आती  है तो इधर लडके आते हैं.हम इज्जत  वाले हैं तुम देखना बेटा!." मैंने पिंकी से पूछा -"पिंकी कौन लडका इधर आता है,तुम्हारी माँ कह रही थीं.अगर  कोई इधर आता है या तुम्हे तंग करता है तो मुझे बताओ." पिंकी कुछ नहीं बोली पर उस दिन  से घर में रहने पर अगर पिंकी घर में है तो  मैं उसकी तरफ ध्यान रखने लगा.घर की रसोई बिल्कुल पीछे की तरफ थी और वहाँ से एक दरवाजा बाहर की तरफ खुलता था  जिसके बाहर खाली जगह पडी थी .कुछ पेड आदि थे तथा काँटेदार तारों से घर की बाउँड्री बनाई गई  थी.पिंकी रसोई  में काम करते समय हवा आदि आने - जाने के लिए वह दरवाजा खोल लिया करती थी. एक दिन मैंने देखा   कि बाड के  दूसरी तरफ कुछ लडके खडे हैं.मैने डाँटा तो वे चले गए.उस दिन से पिंकी को हिम्मत आ गई.वह लडकों को डाँटकर भगाने लगी.एकाध पर लडकों को  खडा पाकर जब मैं उस तरफ गया तो  जिस ढंग से सीधी -साधी दिखने वाली पिंकी उन पर गरजी उससे मैं आश्चर्य में पड  गया.

         अंबरनाथ में ही मेरी बहन का विवाह स्थानीय रूप से तय हो गया .सुविधा को देखते हुए मैने वहीं से विवाह को संपन्न करने का  निश्चय किया.उस समय मेरे बहुत से बंधु-बांधव  तथा रिश्तेदार अंबरनाथ पधारे.पिंकी ने उन दिनों घर में बहुत काम किया.घर में आए हुए सभी लोग उसके सेवाभाव से बहुत अभिभूत हुए तथा उसे कुछ न कुछ देकर गए.

        उसके कुछ महीनों बाद की बात है ,जब मैं शाम को कार्यालय से घर आया तो श्रीमतीजी ने कहा कि सोनाबाई (वह महिला जो मेरे गैरेज में अपने परिवार के  साथ रहती थी तथा बागवानी का काम देखती थी ) आज पिंकी के बारे में कह   रही थी कि उसका सिद्धनाथ( जो मेरे  पडोसी प्रसादजी के सर्वेंट क्वार्टर में रहता था तथा उनके यहाँ काम करता था ) के साले के साथ लफडा (मुंबई में यह शब्द affair का पर्याय है) है ,जब वह उसे देखती है तो उसकी आँखों में चमक आ जाती है और जब भी वह सिद्धनाथ के घर  आता है पिंकी उसके साथ घंटों बातें करती है.श्रीमतीजी आगे बोलीं कि मैंने उसे डाँट दिया है और कहा है कि पिंकी के बारे में इस तरह की उल्टी-सीधी बातें  मत करना.

        खैर, कुछ दिनों के बाद पता चला कि सोनाबाई ने जो कुछ भी कहा था वह असलियत थी.पिंकी को बहुत समझाने-बुझाने की चेष्टा की गई पर वह सिद्धनाथ के साले से विवाह करने पर आमादा थी.सिद्धनाथ का साला माँ-बाप का अकेला लडका है तो क्या हुआ,निकम्मा है , आवारा है- आदि उसे बताया गया पर पिंकी पर कोई असर न  हुआ.सिद्धनाथ का साला अलग पिंकी के माँ-पिता को धमकाने लगा.सिद्धनाथ के सास-ससुर आकर कहने लगे कि उनका इकलौता लडका पिंकी के प्रेम में पागल हो गया है तथा कहीं कुछ कर न बैठे  इसलिए जल्द से जल्द पिंकी का विवाह उनके बेटे से कर दिया जाए.अंततोगत्वा तंग आकर पिंकी के माता-पिता ने उसका विवाह  सिद्धनाथ के साले के साथ कर दिया.

        एक दिन  मेरे ताऊजी आए.उन्होने पिंकी के न दिखाई देने पर उसके बारे में पूछा.मैने उन्हे सारी कहानी बताई.इस पर वे बोले-"पिंकी गरीबी के दुश्चक्र में थी और उससे बाहर निकलने के लिए उसने ऐसा किया."
शायद उनकी बात सही रही हो.पर पिंकी तो एक दुश्चक्र से निकल कर दूसरे दुश्चक्र में चली गई थी क्योंकि कुछ ही दिनों के बाद पिंकी के आवारा और निकम्मे पति द्वारा उसके साथ मार-पीट किए जाने की खबरें आने लगीं.

गुरुवार, 23 मई 2013

अरुणिमा के हौसले को सलाम!

        अरुणिमा की कहानी खुद्दारी की,विपरीत परिस्थितियों में भी हौसला न खोने कीऔर हार न मानने की  ,जीवन में आए एक ऐसे तूफान से बाहर निकलने की जिसमें से शायद बहुतेरे बाहर ही न निकल पाते,दृढ   इच्छाशक्ति की,अदम्य साहस की, जीवटता   की और सबसे बढ कर नारीशक्ति की  मनुष्य की  पाशविकता पर  विजय की प्रेरणादायी गाथा है.


        आज से दो वर्ष पहले मैंने समाचारपत्रों में एक समाचार पढा था जो अरुणिमा सिन्हा  के बारे  में था.उत्तर प्रदेश के एक छोटे से नगर अम्बेडकरनगर की निवासी अरूणिमा जो राष्ट्रीय स्तर की वालीबाल खिलाडी थी,  12 अप्रैल 2011 को पदमावती एक्सप्रेस से लखनऊ से दिल्ली जा रही थी.बरेली से  पहले कुछ बदमाशों ने उसके गले से सोने की चेन खींचने  का प्रयास किया.बदमाशों को मालूम नही था कि उन्होने किसी अबला नारी पर नही  बल्कि एक हिम्मती और जीवट वाली लडकी के साथ यह जुर्रत की है.उसने बदमाशों को सीधे चेन दे देने के बजाय उनका मुकाबला किया और जब बदमाशों को लगा कि वे उससे पार नही पाएंगे तो उन्होने उसे ट्रेन से  बाहर धक्का दे दिया.अरूणिमा ट्रेन  के बाहर जा गिरी और दूसरी तरफ  से आ रही ट्रेन से टकरा गई  तथा बुरी तरह से घायल हो गई.उसे गंभीर स्थिति में अस्पताल  में भर्ती कराया गया.बरेली और  अम्बेडकरनगर से मैं जुडा  रहा हूँ अत: स्वाभाविक तौर पर  मैंने वह समाचार ध्यानपूर्वक पढा.मन बडा ही खिन्न हुआ.सरकार क्यों नहीं रेलों में पर्याप्त  सुरक्षा उपलब्ध  कराती जो ऐसी घटनाएं  घटती हैं.उस समय रेलवे विभाग ने कहा था कि कानून और व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है. मैने एक-दो दिन बाद फिर पढा कि अरुणिमा का जीवन बचाने के लिए डाक्टरों ने  उसका बांया पैर काटने का निर्णय लिया है. मन और  भी दु:खी हुआ कि एक बच्ची का कैरियर बर्बाद हो गया.मुझे लगा कि अरुणिमा  अब  तमाम सामान्य लोगों की तरह अपने दु:ख से उबरने की कोशिश करेगी.पता नहीं वह इसमें सफल हो पाएगी या नहीं.जीवन में यदि वह कुछ स्थिरता पा जाए तो उसके लिए अच्छा होगा.पर बदमाशों की तरह मैं भी गलती पर था.अरुणिमा को एक भयावह हादसे के कारण जिसके कारक समाज के ही बदनुमा दाग जैसे अंश थे,  गुमनामी के अंधेरों में खो जाना और अपने सपनों को टूटते देखना मंजूर नही था. मुझे नही मालूम था कि एक बार फिर मैं अरूणिमा के बारे में समाचार पढूँगा और  वह भी इस दुनिया  की सबसे बुलंद जगह उसके द्वारा फतह किए जाने के बारे में.


          कल मैंने समाचारपत्र में पढा कि अरुणिमा ने  मंगलवार ,21 मई को  प्रात: 10.55 पर एवरेस्ट की चोटी पर चढने में सफलता प्राप्त की तथा एवरेस्ट पर विजय पाने  वाली वह भारतवर्ष की  पहली विकलांग है . इसके  अलावा प्रोस्थेटिक कृत्रिम पैर के सहारे एवरेस्ट पर चढने वाली वह विश्व की प्रथम महिला है.

        अरूणिमा का कहना है कि वह नहीं चाहती थी  कि  लोग उसे बेचारगी भरी नजरों से देखें इसलिए उसने  "एवरेस्ट पर विजय" जैसा ऊँचा लक्ष्य का निर्धारित किया.उसने  अपने इरादे अपने  कोच और अपने भाई को बताए.उन्होने उसे प्रोत्साहित  किया.अगर आपके इरादे नेक हों तो मदद करने वाले मिल ही जाते हैं. दुर्घटना के शॉक से बाहर निकल कर उसने भारत की प्रथम एवरेस्ट विजेता महिला बछेंद्री  पाल के दिशानिर्देश में उत्तरकाशी में टाटा स्टील एडवेंच्योर फाउंडेशन में एक वर्ष तक कठोर प्रशिक्षण लिया और वह कारनामा कर दिखाया जिसकी उसकी जैसी परिस्थितियों वाले व्यक्ति से  सामान्यत: कोई उम्मीद नही करता.इसीलिए किसी ने कहा है-

                                           "पंख होने से ही कुछ नहीं  होता,  हौसलों  से उडान होती है.
                                            सपने उन्हीं के सच होते हैं जिनके सपनों में जान होती है.."

        अरुणिमा की  कथा बरबस उस बच्ची की भी याद दिला  जाती  है  जो दिसंबर ,2012 में दिल्ली  की एक बस में कुछ दरिंदों का मुकाबला करते हुए उनकी दरिंदगी का  शिकार हुई.अगर वह बहादुर बच्ची बच गई  होती तो शायद अरुणिमा जैसा ही कुछ कर दिखाती,भले ही किसी दूसरे क्षेत्र में.यदि हम अपनी बच्चियों  को अबला नारी  के बजाए  इन्हीं की तरह बहादुर,दृढप्रतिज्ञ और दिलेर बनाने का संकल्प लें तो देश का नक्शा बदल जाए.