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मंगलवार, 14 मई 2013

असफलता का प्रबंधन


        13अप्रैल को मैंने एक समाचार  पढा कि आई. ए.एस.  में चयन होने के लिए आशान्वित एक 24  वर्षीय नवयुवक वी.वाई.मंजुनाथ ने आत्महत्या कर ली क्योंकि चयनित अभ्यर्थियों की सूची में उसका रोल नं. 264वें क्रमांक पर मेरिट में होने के बावजूद नाम उसका न होकर किसी आश्विन बी. का था  और इस बारे में जब उसने यू.पी.एस.सी.से संपर्क किया तो उसे समुचित और संतोषप्रद उत्तर  नही मिला था.मंजुनाथ इंजीनियरिंग डिग्री  प्राप्त था. यू.पी.एस.सी. की परीक्षा के लिए यह उसका प्रथम प्रयास था.उसने कोई कोचिंग नही की थी.उसके पिता सरकारी क्लर्क हैं और बहुत अच्छी आर्थिक स्थिति में नही हैं.उन्होने मंजुनाथ की इंजीनियरिंग की पढाई के लिए कर्ज लिया था.

        इसी समाचार के बारे में मैंने आज  दिनांक 14 अप्रैल को यू.पी.एस.सी का स्पष्टीकरण पढा कि मंजुनाथ  वास्तविकता में प्रारंभिक परीक्षा  (प्रिलिम.)में ही असफल रहा था तथा इस कारण मुख्य परीक्षा में वह बैठा ही नही था.संभवत: उसने अपने घर में झूठ बोला था तथा घर वालों को अपना रोल नं. गलत बताया था जो एक सफल उम्मीदवार का था.

        यह समाचार पढने के  बाद जब मैं कल घर आया तो  मैंने सबसे पहले अपने बेटे से इस बारे में बात की  क्योंकि मुझे लगा कि यह आवश्यक है कि हम अपने बच्चों को असफलता का प्रबंधन करना सिखाएं.गत वर्ष भी मुझे इसी प्रकार के एक समाचार ने बहुत उद्वेलित किया था.कोलकाता के एक इंजीनियरिंग ग्रेजुएट ने  बंगलौर में नौकरी से हटा दिए जाने के बाद आत्महत्या  कर ली थी.

        सफलता,सफलता कैसे पाई जाए,सफलता पाने के उपाय,...आदि,....आदि क्षेत्रों में सफल कैसे हों,  सफलता और  उससे संबंधित इन विषयों पर सैकडों  नहीं हजारों- हजार पुस्तकें हैं .पर कोई भी पुस्तक आपको यह नही बताती कि असफलता   का प्रबंधन कैसे करें जबकि आज के गलाकाट प्रतियोगिता के युग में उसकी जरूरत ज्यादा है.


  असफलता के प्रबंधन के मेरे विचार से दो पहलू हैं-

                       1.आत्मप्रबंधन-स्वयं यह समझना कि एक असफलता से मेरे लिए दुनिया नही खत्म हो गई.जिस भी  क्षेत्र में असफलता मिली है उससे आगे मेरे लिए जहाँ और भी है और मुझे उस जहाँ के लिए,उसे बेहतर बनाने के लिए, उसे पाने के लिए जीना है.मेरे अंदर यदि  कुछ कमी है तो उसे दूर करँगा,मैं खुद को और बेहतर बनाने की कोशिश  करता रहूँगा और खुद  को बेहतर साबित करूँगा.मुझमें अगर बहुत कुछ कर पाने की नही, तो कुछ कर पाने की क्षमता जरूर है जिसे मैं अंजाम तक पहुँचाऊँगा.उसके लिए मैं पुरजोर कोशिश करँगा.अगर जीवन में कुछ नही मिल पाया तो  कोई बात नही, पाने को अभी बहुत कुछ और भी है.अगर आज कुछ मेरे अनुकूल नही था तो इसका यह मतलब नही कि कल भी मेरे अनुकूल नही होगा.मैं हार नही मानूँगा और कोशिश करता रहूँगा.

                       2.असफलता के विभिन्न पहलुओं,उसके परिणामों और उपलब्ध विकल्पों का  विश्लेषण कर अपने लिए सबसे उपयुक्त रास्ता चुनना और उस पर दृढता के साथ चलना.


      मेरे विचार से मंजुनाथ को या अन्य किसी को भी जो उस स्थिति में हो खुद से निम्नलिखित सवाल करने और खुद को उनके जवाब देने चाहिए थे-

क्या इस असफलता के साथ मेरे लिए दुनिया में सब कुछ खत्म हो गया है?
-नही

क्या मेरे लिए सारे रास्ते बंद हो चुके हैं?
-नहीं

क्या मैं एक कोशिश और नही कर सकता?
-हाँ,मै कर सकता हूँ?

क्या मुझे सफलता प्राप्त होनी ही चाहिए थी?
-नही यह जरूरी नहीं. क्योंकि देश में आयोजित होने वाली सर्वोच्च स्तर  की  परीक्षाओं में से यह एक है,जिसमें तमाम सारे बच्चे बैठते हैं.इनमें सर्वोत्कृष्ट मेधा वाले और अथक  परिश्रम करने वाले बच्चे ही लिखित परीक्षा में चयनित हो पाते हैं.साक्षात्कार स्तर पर भी एक-एक  सीट के लिए कम  से छ: बच्चे ऐसे होते हैं जो हर दृष्टि से समान होते हैं.एक-एक अंक के भी  अंतर से मेरिट में बहुत अंतर आ  जाता है.जहाँ भी समान योग्यता के लोगों में प्रतियोगिता होती है वहाँ गौण समझा जाने वाला बिंदु भी महत्वपूर्ण हो जाता है तथा  न चाहते हुए स्वीकार करना पडता है कि भाग्य की अपनी एक भूमिका का निर्माण हो  जाता है.

क्या मुझे और विकल्पों के बारे में भी सोचना चाहिए?
-निश्चय ही जब आप उच्च  स्तरीय प्रतियोगिता में बैठते हैं तो आपको असफलता की संभावना के बारे में सोचकर अपने लिए कुछ अन्य विकल्पों के बारे में सोचना तथा उन्हे खुला रखना चाहिए.

क्या असफल रहने पर मैं एक और कोशिश कर सकता हूँ?
-क्यों नहीं?मैं अपना विश्लेषण करूँगा तथा देखूँगा कि मेरे स्तर पर क्या कहीं कमी  रह गई?क्या मैं किसी  भी  प्रकार, किसी भी तरह अपने प्रयत्न को और बेहतर बना सकता हूँ?यदि हाँ तो मैं वह कोशिश जरूर करूँगा.यदि मैं नही भी कर सकता हूँ  तो भी एक और कोशिश करने में कोई हर्ज  नही है.क्या पता कल भाग्य मेरे साथ हो.

अगर आज का दिन मेरा नही था तो क्या कल का दिन भी मेरा नही होगा?
-नही,बिल्कुल नही. क्योंकि हो सकता है कि कल परिस्थितियाँ बिल्कुल मेरे  अनुकूल हो जाएं.

अगर फिर भी सफलता नही मिलती है तो?
तो कोई बात नहीं,मैं अन्य उन विकल्पों की दिशा में प्रयास करँगा जो मेरे लिए खुले हैं.

        असफलता प्रबंधन का महत्व उन बच्चों के लिए ज्यादा है जो पूरी तरह से सेक्योर वातवरण में पले-बढे हैं,जिन्होने कभी तकलीफ देखी नही और किसी समस्या का सामना नही किया.अगर अब तक उनके हाथ सफलता ही लगती रही है और उन्होने असफलता का मुंह ही नही देखा है तो ऐसे मेधावी बच्चों को  हिला देने के लिए एक ही असफलता काफी है.इसलिए बच्चों को बताएं कि असफलता भी हमारे जीवन का एक हिस्सा है और मजबूत चरित्र के हार न मानने वाले लोग असफलताओं की बुनियाद पर ही सफलताओं  के महल खडे करते हैं.उनके सामने उनका उदाहरण रखें जो सी.पी.एम.टी.में सफल  नही हो पाए पर आज उच्च कोटि के विश्वविद्यालय में फैकल्टी हैं.जो इंजीनियरिंग की परीक्षा में असफल रहे पर सिविल सर्विस की परीक्षा में सफल रहे  या फिर वैज्ञानिक हैं.मैं व्यक्तिगत  तौर पर ऐसे लोगों को जानता हूँ.

        प्रतिकूल परिस्थितियों में भी संघर्ष कर अपने लिए रास्ता बनाने वाले महापुरूषों के उदाहरण दें.शिवाजी कई किले हार जाने के बाद जब जयसिंह के समझाने पर औरंगजेब से संधि करने गए तो उसने उन्हे नजरबंद कर दिया.पर उन्होने हार नही मानी.वहाँ से भाग निकलने की जुगत निकाली और फिर से लडाई कर  अपने सारे किले वापस ले लिए.हुमायूँ भारत का साम्राज्य शेरशाह के हाथों गवाँ बैठा था.पर जीवन के सांध्यकाल में अपनी कोशिशों से वह अपना खोया हुआ साम्राज्य वापस पाने में सफल रहा.महाराणा प्रताप  को जंगलों की खाक छाननी पडी पर एक  दिन भामाशाहस्वरूप जैसे स्वयं भगवान प्रकट हुए.महाराणा प्रताप ने फिर से अपनी सेना खडी की और चित्तौड छोडकर शेष राज्य अकबर से वापस छीनने में सफल रहे.

हरिवंश  राय बच्चन की निम्नलिखित पंक्तियों और ऐसे ही अन्य उद्धरणों से बच्चों को प्रेरणा प्रदान करें-

असफलता एक चुनौती है ,इसे स्वीकार करो
क्या कमी रह गई ,देखो और सुधार करो.
जब  तक न सफल हो ,नींद चैन को त्यागो तुम
संघर्ष का मैदान छोडकर मत भागो  तुम.
कुछ किए बिना ही जय-जयकार नही होती,
कोशिश करने वालों की हार नही होती.

इति!


 
   


शनिवार, 11 मई 2013

पी.एम.और नमक का दरोगा

        यह शीर्षक देख कर आप चौंक गए होंगे कि आखिर पी.एम. और नमक के दरोगा में क्या संबंध है.चलिए बताता हूँ.

       "नमक का दरोगा" मुंशी प्रेमचंद की सुप्रसिद्ध कहानी है जो उस देश-काल की है जब ब्रिटिश सरकार ने नमक पर टैक्स लगा दिया था.आप लोगों में से कई लोगों ने यह कहानी पढी भी होगी.नमक के दरोगा का नायक वंशीधर एक चरित्रवान,कर्तव्यपारायण नवयुवक है जो अपनी ड्यूटी के प्रति वफादार, मुस्तैद,पक्का और पाबंद है.एक दिन रात में उसे यमुना के पुल पर से गुजरती गाडियों की आवाज और कोलाहल सुनाई देता है. वह वर्दी पहन कर,अपने जमादार को साथ में लेकर पुल पर पहुँच जाता है.नमक का दरोगा कडकती हुई आवाज में गाडियों को रुकने का आदेश देता है और पूछता है कि गाडियाँ किसकी हैं.गाडी का कोचवान पं अलोपीदीन का नाम लेता है जो दातागंज के प्रसिद्ध जमींदार,रईस और व्यापारी हैं. वह गाडियों से अपने घोडे को सटा कर लदे हुए बोरों की टोह लेता है तो उसका शक पुख्ता हो जाता है  कि उनमें नमक है जो  टैक्स की  चोरी करते हुए  कांनपुर ले जाया जा रहा है. नमक का दरोगा पं अलोपीदीन  को बुलाने का हुक्म देता है. पं अलोपीदीन आते हैं और दरोगा वंशीधर को रिश्वत देकर बचने का प्रयास करते हैं.वे एक हजार से आरंभ कर चालीस हजार तक का प्रस्ताव देते हैं. वंशीधर कहता है कि चालीस हजार  तो क्या चालीस लाख भी उसके ईमान को डिगा नहीं सकते और जमादार को उन्हे हिरासत में लेने का हुक्म देता है. पं. अलोपीदीन न्यायालय
द्वारा छोड दिए जाते हैं क्योंकि न्यायतंत्र और प्रशासन सभी बिके हुए थे.दरोगा वंशीधर मुअत्तल होकर घर चले आते हैं.कुछ दिनों के बाद उनके घर पर पं. अलोपीदीन पधारते हैं  और उनके चरित्र की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए उन्हे प्रचुर  वेतन और सुविधाओं के साथ अपनी समस्त एस्टेट और जायदाद का मैनेजर नियुक्त करने का प्रस्ताव देते हैं  जिसे थोडे ना-नुकुर के बाद वंशीधर स्वीकार कर लेते हैं.

        बहुत पहले कभी लखनऊ में एक परिचर्चा के दौरान सुप्रसिद्ध लेखिका शिवानी  ने इस कहानी को असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक बताते हुए  प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियों में से  एक बताया था.उस परिचर्चा में उपस्थित मेरे  ताऊजी ने इसकी चर्चा मुझसे करते हुए कहा था कि मैं शिवानी के कथन से सहमत नही हूँ क्योंकि प्रेमचंद की इस  कहानी में अंततोगत्वा एक ईमानदार आदमी एक बे‌ईमान आदमी का नौकर बन जाता है.  इस कहानी में अंतरनिहित एक अन्य संदेश यह है कि बे‌ईमान लोगों को  भी  अपने मामलों का प्रबंधन करने के लिए ईमानदार लोगों की जरूरत अनुभव होती है.

       परसों जब किसी पत्रकार ने सुश्री रेणुका चौधरी से यह प्रश्न किया कि सी.बी.आई. की कोयला घोटाले से संबंधित रिपोर्ट बदले जाने में पी.एम.ओ. के अधिकारियों की भी संलिप्तता पाई गई है और इस प्रकार क्या रिपोर्ट बदले जाने का दोष  प्रधानमंत्री पर भी नहीं आता तो सुश्री रेणुका चौधरी का कहना था कि प्रधानमंत्री अपनी ईमानदारी के लिए विख्यात  हैं और उन पर किसी प्रकार का प्रश्नचिह्न नही लगाया जा सकता.कांग्रेस पार्टी और उसका नेतृत्व, जब भी कोई मामला उछलता है,प्रधानमंत्री की ईमानदारी की दुहाई देना शुरू कर देती है या यूँ कहें कि उसकी शरण लेने का प्रयास शुरू कर देती है.यह बात मुझे सहज पं अलोपीदीन और वंशीधर का स्मरण करा देती है.जब वंशीधर, पं अलोपीदीन के चाकर बन गए होंगे तो उसके बाद पं अलोपीदीन भी यह कहने की स्थिति में रहे होंगे कि मेरे मैनेजर की ईमानदारी तो विख्यात है फिर मेरे यहाँ कोई बे‌ईमानी कैसे हो सकती है.दूसरी बात यह है कि जब पं अलोपीदीन का सारा साम्राज्य शोषण और बे‌ईमानी पर आधारित था तो उनके साथ जुड  कर कितने दिन वंशीधर अपनी आत्मा को बचाए रख सके होंगे.

        उक्त पर मुझे साहित्यिक जनों की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी.

मंगलवार, 7 मई 2013

ये लो कहाँ आ गए हम-भारतीय राजनीति में निर्लज्जता की नई पराकाष्ठा!

      हमारे एक  रेलमंत्री लालबहादुर शास्त्री थे जिन्होने रेल दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी स्वयं पर लेते हुए त्यागपत्र दे दिया था और एक हमारे वर्तमान रेलमंत्री हैं जिनकी छत्रछाया में एक सदस्य रेलवे बोर्ड की नियुक्ति हुई और इसके लिए उनके भांजे-भतीजे ने दो करोड रूपयों का सौदा किया जिसकी पहली नब्बे लाख रूपयों की नकद किस्त की रंगे  हाथों बरामदगी हुई,लेकिन  साहब उनकी कोई जिम्मेदारी नही बनती है !.घरवाले,रिश्तेदार,दोस्त-अहबाब,राजनीतिक एजेण्ट राजनीतिज्ञों के नाम पर जो चाहे करें,जिससे जितने चाहे रूपए लें ,दस-दस करोड तक की माँग करें पर साहब नेताजी की कोई जिम्मेदारी नही है!नेताजी जो नेताजी ठहरे!नैतिकता की सारी  सीमाओं से परे!उनका दर्जा अब भगवान का हो गया है.उनके प्रति सिर्फ श्रद्धा रखनी  चाहिए.उन पर किसी भी प्रकार का प्रश्नचिह्न लगाना पाप है.राम-राम!ऐसा पाप मत करना.इसीलिए तो साहब पूरी  पार्टी पूरी ताकत से एक तथाकथित ईमानदार प्रधानमंत्री के नेतृत्व में उनके पीछे खडी है.बेवकूफ थे  के डी मालवीय, बूटासिंह और बंगारू लक्ष्मण  जिन्होने इस्तीफा  दिया था  और जिन्होने  उन्हे इस्तीफा दिलवाया था वह भी छोटी रकमों के लिए.

        कालिख धोने का हक सबको है तो फिर  सरकार को क्यों नही. सी बी आई हमारी नौकर है,हमने  रिपोर्ट बदलवाई तो क्या?हम कालिख न धोएं क्या?हमारे प्रधानमंत्री ईमानदार हैं,इसलिए ईमानदारी का तमगा हमारे पास है.परदे के पीछे हम जो चाहे वह करें,अगर परदा खुल भी गया तो क्या!नया जमाना आ गया है साहब!अब लोग नई तरह की फिल्में,नए तरह के  नाटक देखना पसंद करते हैं.मल्लिका शेरावत और सनी लियोन को भूल गए क्या? अरे साहब वह तो पी एम ओ के एक अदने अधिकारी ने रिपोर्ट देखी थी और व्याकरण की त्रुटियों को सुधारने के निर्देश दिए थे.कानूनमंत्री,सॉलिसिटर जनरल सब तो यही कर रहे  थे,व्याकरण संबंधी  त्रुटियाँ ठीक करवा रहे थे.यह सरकार व्याकरण का विशेष ख्याल रखती है.इस देश का और कुछ बुलंदियों पर पहुँचे न पहुँचे ,अपनी भाषाई सतर्कता के चलते यह सरकार भाषा को जरूर नई  ऊँचाइयों पर पहुँचा देगी.भाषा को ऐसा बना देगी जो जनता की समझ से परे हो.भूल जाओ अब्राहम लिंकन को.यह जनता का शासन जनता के द्वारा जनता के लिए नही है.अब तो जनता के द्वारा जनता के शोषण के लिए देश को लूटने का अरमान रखने वालों का शासन है. फिर   जनता ने मालिक बनाया है पूरे पाँच साल के लिए,हम इसी प्रकार पुरजोर सेवा करेंगे जनता की.भला  सेवा करने के लिए भी इस्तीफा देना पडता है क्या?सेवा करने से तो मेवा मिलता है,यह इस देश की  पुरानी कहावत है,फिर हम क्यों न  खाएं मेवा !

       हम्माम में नंगे वह भी  हैं, हम  भी हैं.हम नागनाथ हैं तो वह  साँपनाथ हैं, इसलिए जनता को तो हममें से ही एक को चुनना है. हम नही तो वह सही,वह नही तो हम सही.देख लो कर्नाटक  में हम वापस आ रहे हैं .काटजू साहब ने कुछ दिनों पहले बताया ही है कि इस देश की अधिकांश जनता क्या है.इसलिए हमारा खेल बंद होने वाला नही है,यह चलता ही रहेगा.जाति और धर्म के नाम पर  लोगों को बाँटकर हम थोक में वोट पाते रहेंगे,चिल्लाने वालों चिल्लाते रहो तुम सब!


मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

अपराधों को जन्म देने वाली कॉकटेल

                 दिल्ली में दिसंबर में घटित घटना और अब अप्रैल में घटित घटना में अनेक समान बिंदु हैं. दोनों में ही अपराधियों ने शराब का सेवन किया था.वे सेलिब्रेशन के मूड में थे.दोनों ही समूह वैश्याओं की तलाश में थे  पर अंतत:उन्होने अपना शिकार मासूम बच्चियोँको बनाया-पहले समूह ने एक वयस्क बच्ची को और दूसरे ने एक शिशु बच्ची को.दोनों ही समूह शिक्षा के संस्कार से वंचित स्कूल ड्राप-आउट  के थे और दिहाडी या ऑड जॉब करने वालों के थे,हाँ पहले समूह में एक फिजिकल ट्रेनर भी था,पर निश्चय ही वह कुसंगति में पड  गया था.दोनों ही समूह पहले भी इस प्रकार के अपराध में लिप्त हो चुके थे.एक अन्य समानता जो महज संयोगवश हो सकती है ,वह यह है कि दोनों में ही शिकार बच्चियाँ गरीब तबके की थीं.पहले समूह के डिस्पोजल पर एक बस भी थी पर दूसरे समूह के पास ऐसा कोई साधन नही था इसलिए उन्होने सबसे आसान शिकार पडोसी की अबोध बच्ची को चुना.दूसरे समूह ने शराब का सेवन करने के साथ-साथ ब्ल्यू फिल्म भी मोबाइल पर देखी(समाज में टेक्नॉलॉजी  के प्रसार और गरीब तबके तक  उसकी पहुँच का यह भी एक रूप है) और यह सब यह दर्शाता है कि यौन अपराधों को जन्म  देने वाली कॉकटेल किस तरह तैयार होती और असर करती है.

              इसके साथ मैं आरुषी कांड का भी उल्लेख करना चाहूँगा क्योंकि इस कॉकटेल के अंश वहाँ भी मिलते हैं.डॉक्टर दम्पति के घर में काम करने वाला नौकर जो स्वयं  अपनी तथा आरुषी की हत्या के कारकों में से एक था,भी शिक्षा के संस्कार से वंचित स्कूल ड्राप-आउट था तथा छोटे-मोटे काम की तलाश में मेट्रो शहर में  रह रहा था.नौकर हेमराज के कमरे में पुलिस को "थ्री मिस्टेक्स  आफ माइ लाइफ" की एक प्रति मिली.हेमराज इस पुस्तक को पढ नही सकता था, अत:  सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि यह पुस्तक कौन पढ रहा था.निश्चय ही आरुषी  को इस पुस्तक को पढने योग्य परिपक्व नही माना जा सकता.अब कोलकाता  में कल घटी  घटना का उल्लेख करते हैं.छ: वर्ष की एक छोटी बच्ची एक शिक्षिका के यहाँ ट्यूशन पढने जाती थी.कल वहाँ जब  वह गई तो शिक्षिका नही थी.शिक्षिका के चौदह वर्ष के बेटे ने उस बच्ची के साथ जबरदस्ती कर डाली.फिलहाल पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया है. मध्यमवर्गीय तबके के एक अल्पवय किशोर या किशोरी को जो एक्स्पोजर इन दिनों अपने चारों तरफ मिल रहा है( जिसकी  चर्चा मैंने अपनी पिछली पोस्ट-क्षरित हो रही नैतिकता, में की थी) उसमें ऐसे अपराध में उसका संलग्न हो जाना आश्चर्य का विषय नही है.

             मेरा  कुल कहने का आशय यह है कि जहाँ हम अपराधियों को मृत्युदंड देने की या फिर उन्हे अरब देशों की भाँति दंडित करने की माँग कर रहे हैं वहीं अपराधों को जन्म देने वाली काकटेल को भी तैयार होने से रोकने की दिशा में विचार करें ताकि अपराध को जड से खत्म करने की दिशा में काम किया जा  सके.

शनिवार, 20 अप्रैल 2013

क्षरित हो रहे नैतिक मूल्य

           दिल्ली में एक छोटी बच्ची के साथ घटी हृदयविदारक घटना ने करोडों मनों को व्यथित कर दिया है.कोई समाज को अपशब्द कह रहा है तो कोई देश को,कोई देश के लोगों को घटिया बता रहा है तो कोई समाज को सडा-गला हुआ बता रहा है.देश की राजधानी में घटी अमानवीय या यूँ कहा जाए कि दानवीय घटना पर लोगों की इस प्रकार की प्रतिक्रिया स्वाभाविक है.  देश की प्रशासनिक,विधिक और पुलिस व्यवस्था में निश्चय ही सुधार की जरूरत है पर साथ-साथ इस तरफ भी ध्यान दिए जाने की जरूरत है कि समाज में नैतिक मूल्यों का क्षरण बडी तेजी के साथ हुआ है.पहले हम अपने मां-बाप और शिक्षकों से नीति और दुनियादारी का पाठ सीखते थे.खाली समय में गीता प्रेस,गोरखपुर की पुस्तकें पढते थे या फिर शिक्षापूर्ण बाल पत्रिकाएं पढते थे.मेरे मामा ने मुझे बचपन में चरित्रनिर्माण करने वाली अनेक प्रेरक धार्मिक, पौराणिक और ऐतिहासिक घटनाएं सुनाई थीं.  आज बच्चा जीवन के अधिकाधिक पाठ टी वी और सिनेमा से सीख रहा  है.अभिभावकों और शिक्षकों को उस  पुरानी भूमिका की तरफ वापस लौटने की जरूरत है. "सैयाँ फेविकोल से"  जैसे गाने चतुर्दिक बजते हैं और जब बच्चा इन पर ठुमकता  है तो माता-पिता अत्यधिक प्रमुदित होते हैं.कामोद्दीपक विज्ञापनों,गानों, कार्यक्रमों की बाढ सी आई हुई  है.विद्यालयों के वार्षिक उत्सवों में भी इसी प्रकार के कार्यक्रम दिखाई देते  हैं.और तो और, सामाजिक -धार्मिक उत्सवों में भी यही या इन पर आधारित कार्यक्रम किए जा रहे हैं. इनके प्रभाव से समाज को बचाने की जरूरत है.कमजोर होकर चरमरा रहे नैतिक ढाँचे को सशक्त बनाने और  भारतीय समाज के परम्परागत  मूल्यों(यहाँ मेरा आशय जातिसदृश रूढिगत प्रतिमानों से कदापि नही है) को फिर से स्थापित करने की आवश्यकता है.
         यहाँ मै एक घटना का उल्लेख  करना चाहूँगा.मेरी छोटी बहन मुझसे उम्र में नौ  वर्ष छोटी है.जब वह प्राइमरी शिक्षा ग्रहण कर रही थी तब मै कालेज में था और अभिभावक के तौर पर कई बार उसके विद्यालय जाया करता था.एक बार मै उसकी प्रधानाचार्या के पास किसी सिलसिले में बात करने गया था.उस समय दो अन्य अभिभावक भी वहाँ मौजूद थे.उनमें से एक के बच्चे को विद्यालय  से निकालने की नोटिस दी गई थी.वह बच्चा गालियाँ दिया करता था.प्रधानाचार्या का कहना था कि वह उस बच्चे को विद्यालय में रखेगी तो और बच्चे खराब हो जाएंगे.यह सुनकर अन्य दूसरे अभिभावक ने जो एक मुस्लिम बंधु थे,कहा- "राम-राम  बच्चे ने गालियाँ सीख  ली हैं.मैडम हम तो अपने बच्चे को सुबह सबसे पहले कलमा पढाते हैं. बच्चे इस तरह दिन की शुरुआत कर अपने बाकी काम करते हैं".तो हम सबको बच्चों को कलमा पढाने  की, या यूँ कहें कि उन्हें मजबूत नैतिक  आधार देने की ,उसकी आधारशिला पर उन्हें स्थापित करने की जरूरत है.सन उन्नीस सौ बीस के आस-पास भारत घूमने आए एक विदेशी यात्री ने भारतीयों के मजबूत नैतिक  बल का उल्लेख करते हुए लिखा था कि यहाँ  अकेले सडक पर जाती हुई महिला की तरफ कोई आँख उठा कर देखता भी नही.हमें वो दिन वापस  लौटाने की जरूरत है. यह कार्य यदि समाज के अभिजात्य एवं मध्यमवर्ग तक सीमित रहेगा तो भी आधी सफलता ही मिलेगी.इसलिए समाज के गरीब और पिछडे तबके तथा शहरों की झोपडपट्टियों के लोगों को भी नैतिकता जागरण के अभियान में शामिल करना होगा.

मंगलवार, 19 मार्च 2013

तत्वज्ञान- रेलयात्रा के दौरान (लघुकथा-संस्मरण पर आधारित)

           आज से लगभग पच्चीस वर्ष पूर्व की बात होगी.मैं अपनी कॉलेज शिक्षा समाप्त करने के उपरांत प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था तथा फैजाबाद से, जहाँ मेरे पिताजी उन दिनों नौकरी के सिलसिले में तैनात थे,प्राय: लखनऊ जाया करता था.ऐसे ही अपने एक सफर के लिए जब मैं फैजाबाद  रेलवे-स्टेशन पहुँचा तो पता चला कि लखनऊ के लिए दून एक्सप्रेस आने वाली है.मैंने थोडी देर इंतजार  किया और जब दून एक्सप्रेस आ गई तो उसके एक जनरल डिब्बे में  दाखिल हो गया.डिब्बे में मैंने इधर-उधर निगाह घुमाई तो एक तरफ खाली जगह नजर आई.मैं उस तरफ जाकर खाली पडी जगह पर बैठ गया.मेरे बगल में एक नौजवान बैठा हुआ था और सामने की सीट पर, खिडकी के बगल एक बुर्कापोश मोहतरमा बैठी हुई थीं. थोडी देर के बाद के बाद किसी स्टेशन पर एक व्यक्ति और चढा तथा उन मोहतरमा के बगल पडे खाली स्थान पर बैठ गया.कुछ देर में इस नए यात्री ने अपनी जेब से एक सिगरेट निकाली और सुलगा ली.कुछ देर के बाद मैंने देखा कि वह नौजवान अपने स्थान से उठा और मोहतरमा के बगल की खिडकी जो शायद परदा करने के  लिहाज से या अन्य किसी वजह से बंद कर दी  गई थी,खोल दी.नए यात्री ने अपनी एक सिगरेट खत्म करने के बाद दूसरी सिगरेट निकाली और सुलगा ली.अब नौजवान उसकी तरफ मुखातिब हुआ तथा नफीस अंदाज में उससे बोला-"आप जरा मेहरबानी कर सिगरेट दूसरी तरफ जाकर पी लेंगे.सिगरेट पीने के बाद फिर यहाँ आकर बैठ जाइएगा".इस पर दूसरा यात्री खडा हो गया,उसने डिब्बे में इधर-उधर नजर डाली तथा थोडा आगे खिडकी  के किनारे एक अकेली सीट देख कर वहाँ चला गया.उस नौजवान का तौर-तरीका मुझे पसंद  आया. आगे  रुदौली स्टेशन आया .यहाँ पर डिब्बे में एक मौलाना साहब चढे जो लहीमोशहीम व्यक्तित्व के स्वामी थे. काली टोपी एवं शेरवानी तथा लहराती हुई दाढी उनके इस व्यक्तित्व में चार चाँद लगा रहे  थे. मौलाना साहब ने    भी डिब्बे में नजर घुमाई तथा नौजवान के सामने खाली जगह देख कर वहाँ आकर बैठ गए.थोडी देर में मौलाना साहब ने नौजवान से बातेँ शुरू कर दीं-"कहाँ जा रहे हैं ?"
"लखनऊ"नौजवान ने उत्तर दिया.
"क्या किसी खास मकसद से जा रहे हैं"
"हाँ,सामने मेरी बहन बैठी हैं.इन्हें मेडिकल कॉलेज में दिखाने के लिए ले जा रहा हूँ"
"क्या इनकी तबियत नासाज है?"
"हाँ,इनका इलाज अकबरपुर में चल रहा था.पर फायदा नहीं हुआ.वहाँ अस्पताल में दिखाने पर उन्होने मेडिकल कॉलेज में दिखाने के लिए कहा है."
"अच्छा,तो आप अकबरपुर में रहते हैं"
"नहीं,मैं रहता तो दिल्ली में हूँ.पर हॉं,मेरा घर अकबरपुर में है.मैं इन दिनों छुट्टी पर आया हूँ."
"अच्छा तो आप दिल्ली में नौकरी करते हैं"
"हॉं,मैं प्लानिंग कमीशन में हूँ."
"आप क्या हैं वहाँ पर?"
"मैं इंजीनियर हूँ."
"साहबजादे! आपने अपना नाम नहीं बताया"
"अशरफ"(काल्पनिक नाम,वास्तविक नाम मुझे भूल चुका है)

              अब मौलाना साहब ने स्वत: अपना परिचय देना शुरू कर  दिया.उन्होने बताया कि वे रहने वाले रुदौली के थे और लखनऊ में सेल्स टैक्स विभाग में नौकरी करते थे.
"अच्छा तो आप सेल्स टैक्स में हैं"नौजवान ने टिप्पणी की.
"श्री.....'क' (काल्पनिक नाम),लखनऊ में सेल्स टैक्स कमिश्नर  हैं न"नौजवान ने पूछा.
"हॉं-हॉं,तुम उन्हे जानते हो"
"मेरे कुछ साथी सेल्स टैक्स डिपार्टमेंट  में डाइरेक्ट पी सी एस ऑफीसर हैं जो मेरे साथ इलाहाबाद युनिवर्सिटी में पढते थे.उन्होने उनके  साथ काम किया है"
" नेक आदमी हैँ मेरा उनके साथ खास अपनापन है. "
"पर मेरे साथी बताते हैँ कि वे बडे भ्रष्ट अधिकारी हैं"
" ऐसा कुछ नहीं है, 'क' साहब भले आदमी हैं  "
              पर नौजवान 'क' साहब के सारे कारनामों से परिचित था.उसने उनकी गतिविधियों का ब्यौरा  देना शुरू कर दिया.मौलाना साहब के पास उसकी बातोँ का जवाब नहीं था.जैसे-जैसे मौलाना साहब श्री 'क' के बचाव में उतरते  नौजवान उनकी  करतूतों का और प्रामाणिक वर्णन प्रस्तुत करता.आखिरकार मौलाना साहब ने हार मानते हुए अपने दोनों हाथ नौजवान के दोनों गालों पर लगाए और कहा-"बेटा ये बताओ कि कौन ये सब नहीं करता.तुम इस तरह की बात,सच्चाई  की ये तरफदारी इसलिए कर रहे हो क्योंकि तुम्हें वह चीज मिली है जो सबको नहीं मिलती,और वह चीज है -इस्लामी तालीम"
            अब नौजवान और मौलाना साहब की बातों का रुख दूसरी तरफ मुड गया.नौजवान ने कहा-"देखिए मै जो बात कह रहा हूँ वह किसी एक धर्म या किसी खास मजहब की नहीं है.ईमानदारी और सच्चाई की बात तो हर धर्म और हर मजहब करता है,वह चाहे हिंदू धर्म हो या इस्लाम या फिर क्रिश्चियनिटी  या भले ही  कोई और मजहब हो."
"पर तुम्हे तो खुदापरस्ती  इस्लाम से ही मिली है."
"देखिए मैं इस्लाम और दूसरे धर्मों में कोई बुनियादी फर्क नहीं पाता हूँ. GOD के तीनों अक्षर G,O एवं D हिंदू धर्म में जिसे ब्रह्मा,विष्णु,महेश कहा गया है उसे ही रिप्रेजेंट करते हैं-Generator,Operator एवं Destroyer के तौर पर, वही इस्लाम में खालिक,खलक और राकिब है{यहाँ मुझे लगता है कि नौजवान को  खालिक (ईश्वर),खल्लाक(सृष्टिकर्ता) और राजिक(अन्नदाता,पालनकर्ता) अथवा राहिम(दयालु)  शब्दों का प्रयोग करना चहिए था,पर मैंने वही शब्द लिखे हैं  जो उसने कहे थे}..गीता में सर्वशक्तिमान ईश्वर की शरण में जाने की बात कही गई है,इस्लाम या क्रिश्चियनिटी भी तो यही कहते हैँ.मैं रामकृष्ण मिशन के आश्रम मेँ भी जाता हूँ.वहाँ वे योग से ईश्वर तक जाने का रास्ता बताते हैं.हम जो नमाज पढते हैं वह भी तो एक तरह का योग ही है.गीता कर्म करने की बात कहती है और कुरान भी.मुझे चरैवेति-चरैवेति की बात बहुत पसंद है और मैं इस्लाम से किसी भी प्रकार से इसका विरोधाभास नहीं पाता हूँ"
            मौलाना साहब चुपचाप नौजवान की बात सुनते रहे  और मैं उसकी बातें सुनकर सोच रहा था कि काश हमारे देश का हर नौजवान इसी प्रकार देश की तरक्की और खुशहाली ,भ्रष्टाचार के विरोध तथा साम्प्रदायिक सौहार्द्र की बात सोचता.खैर, अब तक लखनऊ नजदीक आ गया था और हम सब  उतरने की तैयारी करने लगे.



रविवार, 3 मार्च 2013

सहारा-एक दूसरे का

                      कल शनिवार 2 फरवरी के दिन मैं आर्थोपेडिक क्लीनिक पर अपनी माँ के लिए दवा लेने के लिए गया था.वहाँ एक दृश्य ने बरबस मेरा ध्यान आकर्षित किया और भविष्य की एक लंबी अवधि के लिए मेरे मनोमस्तिष्क पर अंकित हो गया.एक वयोवृद्ध दम्पति क्लीनिक से बाहर निकल रहे थे.दोनो की वय अस्सी वर्ष के लगभग रही होगी.शायद इसमेँ आपको कोई अनहोनी बात नही लग रही होगी.पर आगे सुनिए.दोनो ने एक दूसरे का हाथ थामा हुआ था.वैसे ही जैसे प्रणयावधि के दौरान युगल अथवा शादी के  बाद कुछ समय तक नवदम्पति एक दूसरे का हाथ थामे दिख जाते हैं .शायद आप सोच रहे हैं कि वयोवृद्ध दंपति मे  अभी भी प्रेम तरुण बना हुआ था.दरअसल उनमेँ से एक  दूसरे को सहारा दे रहा था,  पर उनकी अवस्था और चेहरे की झुर्रियोँ को देख कर यह कहना मुश्किल था कि उनमेँ से कौन किसको सहारा दे  रहा था.मैँ भी कुछ देर तक असमंजस के साथ दोनों को देखता रहा.बाद में मैने देखा- वृद्धा अपना पैर कुछ घसीट रही थी.इस आधार पर  मैँने यह निष्कर्ष निकाला कि पत्नी के पैर में कुछ समस्या थी जिसके निदान के लिए वह आर्थोपेडिस्ट के पास आई थीं और यह  पति थे जो उन्हे सहारा दे रहे थे .पति उनका हाथ  थामे हुए रिक्शे तक गए फिर एक दूसरे को सहारा देते हुए दोनो रिक्शे पर बैठे और चले गए.

                    इस दौरान मेरा मनोमस्तिष्क स्थिति का विश्लेषण करने में लगा हुआ था.शायद इन दम्पति की संतानेँ कहीं दूर रहती होंगी अथवा हो सकता है कि कोलकाता और्  मुंबई आदि मेट्रो शहरों के बहुतायत दम्पतियों की तरह इनकी एक ही संतान होगी जो  यदि लडका होगा तो बहू और सास की खट-पट के कारण अलग रह रही होगा और यदि लडकी होग़ी तो अपने पति के साथ कहीं अलग रह रही होगी.एक क्षीण सम्भावना दम्पति के नि:संतान होने की भी हो सकती थी. कम से कम यहाँ एक दूसरे को सहारा देने के लिए दो व्यक्ति तो थे पर कई बार तो इनमेँ से एक के चले जाने के कारण दूसरा अकेला रह जाता है.  इन दिनों मेट्रो शहरों ही नही कई अन्य दूसरे शहरों मे भी अनेक वृद्ध दम्पति इसी प्रकार परिस्थितिजन्य कारणों से अकेले रह रहे हैं.प्रसिद्ध इतिहासकार रामशरण शर्मा के विषय में मैंने पिछले वर्ष समाचारपत्र मेँ पढा था कि वे पटना में अपने आवास में अपनी पत्नी के साथ एकांतवास कर रहे थे.दोनो ही पति-पत्नी चलने-फिरने में असमर्थ तथा वृद्धावस्था के कारण जर्जरित थे.समाचारपत्रों से  खबर मिलने के बाद बिहार सरकार ने उनके पास अपने प्रतिनिधियों को भेजा.पर हर किसी को तो सरकारी प्रतिनिधियोँ का सहारा नही मिल सकता.तो क्यों न  हम कम से कम  अपने आस-पास ऐसे वृद्ध दम्पतियोँ को तलाशें,उनकी खोज-खबर रखें,जरूरत होने पर उनकी सहायता करें और उन्हे भावनात्मक संबल प्रदान करने का प्रयास करेँ.