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शनिवार, 20 फ़रवरी 2016

~ Left-Right Confusions in the Indian Politics~   


        Indian politics suddenly seems to have become a prisoner of Right- Left conflict. The divide is clear so it leaves no space for moderates. You have either to be a tolerant or intolerant, Pro Dalit or Anti Dalit, Pro Hindu or Anti Hindu, Secular or Communal, Pro Modi or Anti Modi. There are no chances for issue based support. Either you come to this side of fence or go to that side. No body cares that there has to be a balancing point between two extremes and only then there can be a proper balance which holds the democracy.

       For long left has been a regional force only in Indian politics and for sometime it seemed that sooner or later it would become marginal. Wheresoever Left has been strong Right has been a marginal force only. In the left dominated regional areas whenever Right made efforts to raise its head, Left had no qualms in crushing it even by violent means. Right also tried, though mostly in vain , to match violence by violence. Yet lately left has been having a downward slide which continues and next elections in Bengal and Kerala would decide whether the downward slide continues or could be averted for sometime.

       However Left has been able to hold its forte, despite of right's foray, among worker's unions and associations as well as such educational institutions where political debate has been a norm. To me the reason seems that while left is a natural choice for workers due to espousing of class struggle, for starry eyed romantic youth also it becomes a choice as a means of creating an equal world where all the oppressed are supposed to get an equal opportunity. As a student in my youth I went through a stage when left attracted me.

        Nearly thirty-thirty five years ago student youth wings of extreme left started making forays in the educational institutions and in many of these they were able to replace the traditional left. The traditional left never expressed anti India sentiments but the extreme left basically being anti establishment has no problem with being associated with activities which may be called anti Indian or anti national.Since the left found itself pushed to the corner by extreme left, to find the lost centre space at leftist bastions, it also started following tactics of extreme left. That is why we find a Kanhaiya of ASFI organizing a function for Afzal Guru and then caught in a nightmare as the programme is hijacked by extreme left as well as pro separatists. Extreme left considers separatists as a natural ally in its cause of throwing out a democratically elected government and establishing its own hegemony in the country.

        Rahul Gandhi's Political immaturity becomes pronounced as he joins the bandwagon of leftists in a conflict that is actually a Right- Left rivalary. This way he has given an opportunity to the right to dub him anti national and paint a right- left+extreme left +separatist conflict as a National- Anti National conflict. He has ceded the middle ground which was strong point of Congress for decades, to other parties. Many other opposition parties have also jumped the gun but basically being caste based parties they are not going to suffer as much in the process as much Congress . 

        Congress has decided to highlight Rohith Vemula issue along with J N U 's case to escape anti national tag and keep Dalit agenda on top.

        Here the question arises how Rohith Vemula remains a " Bharat Ma Ka Lal " (a la P M ) despite of organizing a function for Afzal Guru and how a Kanhaiya Lal becomes anti national for the same cause. Does being national and anti national can also be decided on the basis of caste and a concession can be given due to caste? Our national parties should answer this question.

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2016

वो नदी वो शजर की छाँव छोड आए हैं (गजल)

                        -गजल-
वो नदी वो शजर की छाँव छोड आए हैं हम
जब से शहर के इस जंगल में रहने आए हैं हम

वो दुवाओं सी आबोहवा वहाँ छोड़ आए हैं हम
हवा में जहर और शोर बरपा यहाँ पाए हैं हम

मुस्कुराए पर किसी से नाता न जोड़ पाए हैं हम
भागते वक्त की चाल के साथ न दौड़ पाए हैं हम

मौसम को बदलने से न अब तलक रोक पाए हैं हम
पाँव न कुचलें कोई  ये परवाह कहाँ छोड़ पाए हैं हम

अपनेपन और मुहब्बत से मुँह मोड़ आए हैं हम
'संजय' वहाँ कितनों का दिल तोड़ आए हैं हम

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016

वसंत के आगमन के द्योतक सेमल के फूल


        मेरे आवास के दरवाजे पर लगा हुआ सेमल का वृक्ष वसंत के आगमन के साथ- साथ पुष्पित हो मुझे हर्ष से भर देता है। ग्रीष्म के आरंभ के साथ-साथ यह वृक्ष सेमल के श्वेत-उजले सितारे बिखेरना आरंभ कर देता है। लगभग एक मास तक वृक्ष नित्यप्रति दिन-रात इस दान प्रक्रिया को संपन्न करता रहता है। इसके बाद जैसे किसी औघड दानी का खजाना चुक जाए यह महाशय भी शांत हो बैठ जाते हैं।

        जब वर्षा का आगमन होता है तो वृक्ष पुन: कुछ हर्षित दिखाई देता है । पावस के प्रभाव में कभी-कभी झूमता भी दिख जाता है। पर जैसे दानवीर राजा हर्ष अपना सब धन चुकने के बाद अपने वस्त्रों का भी दान कर दिया करते थे , वैसे ही सेमल का वृक्ष जैसे अपने पल्लव-पत्तों को भी वर्षा की समाप्ति के बाद दान करने पर लग जाता है। राजा हर्ष की बहन राजश्री , उनके द्वारा वस्त्र-आभरणों का भी दान कर दिए जाने के बाद वस्त्रादि अपने पास से प्रदान करती थी पर हमारे इन मित्र की बहन सदृश वसंत ऋतु है जिसके आगमन के लिए इन्हें लगभग तीन मास प्रतीक्षा करनी पड़ती है। शीत के आगमन के साथ लगता है जैसे यह तपस्यारत हो जाते हैं और अंत में एकाकी,शांत-क्लांत दिखाई देने लगते हैं।

        जब बसंत ऋतु का आगमन होता है तो वह जैसे अपने इन भइया को लाल- सुर्ख फूलों से सज्जित कर फाल्गुन के लिए पहले से तैयार करना आरंभ कर देती है। इनकी नई वेशभूषा देखकर आकर्षित हो पंछी इनके पास आने लगते हैं । इनमें से कई इनके पुष्पों में कुछ खाद्य ढूँढते हैं और उसका सेवन कर उड़ लेते हैं। इनके पुष्प गौओं और बकरियों को बड़े सुस्वादु लगते हैं और वृक्ष महोदय उनके लिए रोज भूमि पर पुष्पों की लाल-सुर्ख चादर बिछा दिया करते हैं। बच्चों को इनके पुष्प बड़े प्रिय हैं । वे भी इन्हें बीनने चले आते हैं। इस प्रकार यह अपने सारे पुष्पों का फाल्गुन के बाद भी तब तक दान करते रहेंगे जब तक इनका फूलों का यह खजाना चुक नहीं जाता। पर यह ऐसे दानी हैं कि इस दान के बाद और समृद्ध हो जाते हैं। हर दान किए फूल के बदले प्रकृति इन्हें अनमोल राशि से भरी एक फली देती है । फलियाँ धीरे-धीरे बड़ी होने लगती है और जैसे-जैसे गर्मी बढ़ने लगती है सूख कर काली पड़ने लगती हैं। इसके साथ-साथ यह सेमल वृक्ष महाशय एक बार फिर दान के लिए तैयार हो जाते हैं। काली पड़ी फलियाँ पक-पक कर फूटने लगती हैं और उनके भीतर का लुटने के लिए तैयार कोष सफेद गोल सितारों के रूप में उड-उड़ कर चारों तरफ छाने लगता है। लोग कई बार थैले लेकर इन्हें बटोरने आते हैं तो बच्चे शौकिया इन्हें बीनने आ जाते हैं और यह अपना यह खजाना तब लुटाते रहते हैं जब तक वह पूरा का पूरा फिर से खाली नहीं हो जाता।

       मैं पिछले कुछ महीनों से ऐसा व्यस्त हो गया हूँ कि मुझे अपने इन मित्र की तरफ देखने का भी अवसर न मिला और कार्यालय की समस्याओं ने दिमाग में ऐसा घर किया कि प्रकृति एवं ऋतु की तरफ ध्यान देने का अवसर न रहा। कोलकाता में जाते हुए इनके एक भाई पर निगाह पड़ी जो पुष्प सज्जित था। सहसा मुझे अपने इन मित्र का ध्यान हो आया और मन में कौंधा कि क्या इस वर्ष मेरे मित्र के लिए वसंत ऋतु का आगमन नहीं हुआ। क्या यह अभी भी शांत-क्लांत-गंभीर तपस्वी की मुद्रा में हैं या फिर कोलकाता का इनका यह भ्रातृ वृक्ष ही समय से पूर्व पुष्पित हो गया है। आखिर कोलकाता जनसंख्या और प्रदूषण के कारण गर्म भी तो है, गंगा के कूल पर स्थित मेरे घर पर तो मौसम अभी भी ठंडा है, मैंने सोचा। घर लौटा तो रात्रि हो चुकी थी। आज प्रात: बरामदे में निकल कर मैंने प्रथम साक्षात्कार अपने इन मित्र का किया। मेरे लिए सुखद आश्चर्य रूप सेमल वृक्ष महाशय लाल रक्तिम पुष्पों से सजे खड़े थे।

       यानी कि तुम्हारे लिए भी बसंत का आगमन हो गया है, आज तो सरस्वती पूजा है ! सरस्वती - पूजा यानी कि वसंत ही तो! चलो अब जब तक अपनी दान-प्रक्रिया फिर से न पूरी कर लो, यूँ ही खिले-खिले रहना मेरे मित्र!

मंगलवार, 26 जनवरी 2016

67वाँ गणतंत्र दिवस- आत्मसंवीक्षा की जरूरत

          आज का गणतंत्र दिवस हमारे लोकतंत्र के पुनरावलोकन का भी दिन है। लोकतंत्र की यह विशेषता है कि यह आम राय के आधार पर कार्य करता है। जहाँ आम राय नहीं बन पाती वहाँ बहुसंख्या के आधार पर निर्णय होता है। निर्णय हो जाने के बाद बहुसंख्या के निर्णय को अल्पसंख्या को भी स्वीकार करना पड़ता है। पर बहुसंख्या का निर्णय अल्पसंख्या को भी स्वीकार्य हो इसके लिए आवश्यक है कि उसकी संवेदनशीलता का ध्यान बहुसंख्या रखे और दूसरी ओर अल्पसंख्या भी यह ध्यान रखे कि लोकतंत्र के आधारभूत तत्व के अनुसार बहुसंख्या को निर्णय करने और उन्हें कार्यान्वित करने का अधिकार है। बहुसंख्या और अल्पसंख्या के इस प्रकार के पारस्परिक आदरभाव के द्वारा ही लोकतंत्र का समन्वय बिंदु मिलता है जो लोकतंत्र का संतुलन केन्द्र होता हैं। नि:संदेह मतभेद लोकतंत्र का अनिवार्य तत्व है पर लोकहित और देशहित के लिए बहुसंख्या एवं अल्पसंख्या दोनों को समन्वय बिंदु तलाशने ही पड़ते हैं और कई बार इन्हें देखते हुए दोनों कई मसलों पर एकराय भी हो जाते हैं।

          पर पिछले कुछ अरसे से ऐसा प्रतीत होने लगा है कि जैसे हमारे लोकतंत्र के बहुसंख्या और अल्पसंख्या का प्रतिनिधित्व करने वाले पक्षों के बीच से समन्वय का बिंदु और इस प्रकार लोकतंत्र का संतुलन केन्द्र गायब हो गया है । दोनों के बीच शत्रुता का भाव अपने चरम पर है और यह लोकतांत्रिक पद्धति के निर्बाध संचालन में भी बाधा पहुँचाने वाला सिद्ध हो रहा है। संभवतः पिछले आम चुनाव में दक्षिणपंथ का अप्रत्याशित रूप से बहुमत प्राप्त कर लेना, वामपंथ और स्वयं को वामपंथी रुझान वाला प्रदर्शित करने वाले मध्यमार्गियों के लिए झटका देने वाला सिद्ध हुआ है और इस झटके ने उन्हें इतना हिला दिया है कि वे दक्षिणपंथ को किसी भी प्रकार का कोई कंसेशन देने के लिए तैयार नहीं हैं तथा दक्षिणपंथ के उभार को रोकने के लिए अतिरिक्त आक्रामकता का अपनी नीतियों के साथ समावेश करना ही उन्हें एकमात्र उपाय दिखता है । दूसरी ओर दक्षिणपंथी पक्ष उतनी ही तत्परता और दोगुने जोश के साथ वामपंथी और वामपंथी रुझान वाले मध्यमार्गियों का मुकाबला करने के लिए कटिबद्ध है। परिणामस्वरूप दोनों ही पक्षों के बीच कोई भी meeting ground नहीं दिखाई दे रहा है। राज्यसभा को, जहाँ विपक्ष बहुमत में है,सत्तापक्ष की योजनाओं को कार्यान्वित होने से रोकने का जरिया बना लिया गया है । जहाँ विपक्ष ललित मोदी, दादरी,असहिष्णुता और रोहित वेमुला के मामलों लेकर आक्रामक रहा है और इन मुद्दों के आधार पर संसद को न चलने देने की धमकी देता रहा है, वहीं सत्ता पक्ष की तरफ से कुछ संसद सदस्य और कभी-कभी मंत्रिगण आपत्तिप्रद बयान दे देते हैं। राज्यसभा की स्थिति ऐसी है कि मुझे लगता है कि जब कभी भी कोई सत्तापक्ष दो-तिहाई बहुमत प्राप्त कर लेगा , वह इसके अधिकारों में कटौती की बात करेगा।

          वर्तमान प्रवृत्तियों को देखते हुए मुझे लगता है कि शायद अब भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में वह समय नहीं आएगा जब कोई प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू किसी अटल बिहारी वाजपेयी का परिचय किसी विदेशी मेहमान से देश के भावी प्रधानमंत्री के रूप में कराएगा, कोई विपक्षी नेता अटल बिहारी वाजपेयी किसी प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को दुर्गा बताएगा, विपक्ष के नेता के तौर पर कोई लालकृष्ण आडवाणी किसी नरसिम्हाराव की सरकार के बारे में अमेरिका दौरे के समय यह कहेगा कि वह देश की समस्याओं को सुलझाने में सफल होगी, कोई प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव विपक्षी अटल बिहारी वाजपेयी को भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेता बनाकर उसे संयुक्त राष्ट्र संघ के फोरम पर पाकिस्तान के काश्मीर संबन्धी प्रोपोगंडा का प्रतिकार करने की जिम्मेदारी सौंपेगा। हम अब एक ऐसा समय देख रहे हैं जब प्रधानमंत्री विदेशों में विपक्ष पर चुटकी लेने का मौका नहीं छोड़ते हैं और दूसरी ओर विपक्षी पार्टी का एक नेता पाकिस्तान में जाकर वहाँ के टी वी चैनल पर पाकिस्तानियों से भारत की चुनी हुई सरकार के बारे में कहता है कि उन्हें हटाकर हमें लाइए तब भारत और पाकिस्तान के संबन्ध सुधरेंगे।

        67वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर भारत के दक्षिणपंथ और वामपंथ, सत्तापक्ष तथा विपक्ष दोनों को इस बात की जरूरत है कि वे आत्मसंवीक्षा करें तथा एक दूसरे के विचारों का आदर करके हुए उन्हें सहन करने की आदत डालें । वे एक दूसरे की संवेदनशीलता को समझें और संवेदनशील मुद्दों पर समझ-बूझकर सावधानीपूर्वक इस तरह अपने विचार व्यक्त करें कि कोई दूसरा उनसे आहत न हो। देशहित में और लोकहित में समन्वय के किसी बिंदु पर पहुँचने की चेष्टा करें ताकि लोकतंत्र संतुलित रहे। भारतीय राजनीति के सभी पक्षों की यह जिम्मेदारी है कि अति को छोड़कर मध्यमार्ग को वरीयता देते हुए भारतीय लोकतंत्र को देशहित में संतुलित करें ताकि भारतीय लोकतंत्र की गाड़ी जो इन दिनों चरर-चूँ करते हुए चल रही है विकास के पथ पर निर्बाध दौड़ सके।




शुक्रवार, 22 जनवरी 2016

Hindi & Urdu : Identical Sisters

          I'm writing this to emphasize on similarities between Hindi and Urdu. There is a misconception  that Urdu is language of Muslims only or it is a foreign language like 'Arabic'  or 'Persian '.    
          Prior to independence it was fairly common in North India to learn Urdu by Hindus and even by Brahmins. My maternal as well as paternal grandfathers could read and write Urdu, although they belonged to Brahmin Hindu  families of. U P.
          Urdu and Hindi are basically similar languages. They follow same syntax and grammar.They differ only by script and origin of their stock of words. While Urdu is usually written in 'Arabic' script , Hindi is written in ' Deonagari' script. Urdu derives sufficient stock of words from 'Arabic' and 'Persian' while Hindi derives its stock of words mainly from Sanskrit. Due to these two differences they look to be different languages although these are like twin sisters having same syntax and grammar. Despite of their apparent difference they have a large stock of local words of Northern India which are common to both languages. When the influence of 'Arabic' and 'Persian' is somewhat lessened on Urdu and similarly of ' Sanskrit' on Hindi, Urdu & Hindi become identical languages. For example if you listen a Pakistani talking in Urdu and a North Indian in Hindi on T V you would not find any difference in their languages and they can communicate with each other without any difficulty. It is because, colloquial form of both languages is devoid of the literary influence that creates apparent difference between both languages.                                  Urdu is a language of Indian origin which has come into existence due to foreign Arabic and Persian influence as those foreign Muslim invaders who adopted India as their country  made efforts to communicate in the local lingo with the countrymen. In pre-independence and pre-partition days Urdu was a prominent language of the areas covered by  U P,  Bihar & parts of MP of nowadays. In North Western India including Punjab and Kashmir Urdu was learnt and used for administrative, judicial,academic, communication and other purposes.
           Urdu basically means 'an army camp'. So the common language that was being spoken in Mughal Army camps started to be called Urdu. But there have been prominent literary figures who have written in the language when there was no clear difference of Hindi & Urdu yet they called it ' Hindi' (Ghalib did so and despite of using a language laced with persian words he didn't call it Urdu) and Hindvi (Amir Khusro who used language of common folklore). So it is clear that they did not perceive there to be any difference between Hindi and Urdu.
           Here I would like to tell that in Ancient times in North Western India ' Kharoshthi' script was being used which used to be written from Right to left like 'Arabic'. Pillars of 'Ashoka the Great' in this part of India have inscriptions in the ' Kharoshthi' script. Some Budhist literature of that area is also in the same script. So singling out Urdu on this basis (being written right to left) as an alien language is also wrong.
           It was due to National movement for Independence and insistence of a group of national leaders like Madan Mohan Malviya, Sampoornanand, Seth Govind Das e.t.c. on a language with Indian ethos as well as devoid of foreign influence  and at the same time a parallel separatist movement by Muslim League that difference between Hindi and Urdu were created (I'm deliberately using the word created) and started to be highlighted and these twins were separated . The same has been continued even after Independence for poltical purposes. However we should try to understand the reality and see things in correct perspective . 
     
       


शुक्रवार, 15 जनवरी 2016

    ~हिन्द के फौजी (कविता)~

    ~हिन्द के फौजी~
टूट चुका है हिन्दोस्तां एक बार
अब फिर न इसको टूटने देना
मजहबपरस्त एक बार कामयाब हुए
अबके न किसी को कामयाब होने देना।।

गद्दार बशर लाख करें कोशिश
निगहबानों दुश्मन को धूल चटा देना
किस मजहब ने सिखाया खूंरेजी
फरेबियों को रास्ता दोजख का दिखा देना।।

जो दुश्मन आँख उठाकर देखे भी सही
हिन्द के फौजी खुदा के घर उसे पहुँचा देना
नाज है हमें इस जन्नत ओ मुल्क पर
हिफाजत के लिए दाँव पर सब कुछ लगा देना

माँ के दूध की रखी है तुमने लाज
अपने हौसले दिखा दुनिया को बता देना
जाँ की भी परवाह न कर इस मुल्क को
हमेशा के लिए अपना कर्जदार बना लेना।।

जमाना दाँतों तले दबा ले उँगली
बहादुरीभरा वो कारनामा दिखा देना
हर आँख अश्कजदा हो जाए
कुर्बानी का वो जज्बा दिखा देना।।
      -संजय त्रिपाठी





रविवार, 3 जनवरी 2016

मेरे दादाजी की पसंद का फिल्मी गीत

                            
                      
                                              मेरे दादाजी की पसंद का फिल्मी गीत  

          " झिलमिल सितारों का आँगन होगा" इस फिल्मी गीत के साथ मेरी एक याद जुडी हुई है। मेरी तब नौ वर्ष की उम्र थी और मैं अपने सबसे छोटे मामा की शादी में बारात गया हुआ था। मेरे सबसे बडे ताऊ जिन्हें मैं दादाजी कहता था, भी इस शादी में गए हुए थे । वे स्वामी करपात्रीजी के शिष्य थे और वस्तुत: वे उनके एकमात्र गृहस्थ शिष्य थे । स्वामी करपात्रीजी के शेष सभी शिष्य सन्यासी एवं ब्रह्मचारी थे। दादाजी काश्मीरियों जैसे गौरवर्ण के थे और घनी सफेद दाढी-मूँछे रखे हुए थे। सन्यास लेने से पूर्व वे काली टोपी लगाया करते थे । दादाजी ने रेलवे की नौकरी से समयपूर्व सेवानिवृत्ति ले ली थी। उनकी जीवनचर्या का अधिकांश समय पूजा -पाठ में व्यतीत हुआ करता था ।
         मेरे पितामह का देहावसान हो जाने के बाद दादाजी ने दो छोटी बहनों और भाइयों को पढाने-लिखाने से लेकर उनके शादी- विवाह तक की जिम्मेदारी निभाई थी तथा घर में बडे भाई होते हुए भी उनका स्थान पिता के जैसा था। मेरे दादाजी बडे ही अनुशासनप्रिय थे तथा घर में उनके आगे लोग दबी सहमी आवाज में ही बात किया करते थे। मेरे घर में सिनेमा देखना या उसकी बात करना भी एक प्रकार की गुस्ताखी समझी जाती थी। पर मेरा दादाजी से परिचय एक बच्चे के तौर पर था, इस कारण मेरे मन में उन्हें लेकर किसी प्रकार के भय आदि की भावना नहीं थी जैसाकि मैं घर में और लोगों के साथ पाता था। मैं बचपन से उनसे बालसुलभ ढंग से बातें किया करता था तथा वे भी मुझसे स्नेहपूर्वक बातें करते थे।
         मेरे दादाजी को मामाजी की शादी में वी.आई.पी. का ट्रीटमेंट देते हुए एक अलग गाडी में ले जाया गया था। मैं एक दूसरे वाहन में अपने बडे मामा के साथ गया था। बारात जब वधूपक्ष के द्वार पर पहुँच गई और नियत कार्यक्रम आरंभ हो गए तब मैं अपने दादाजी के पास पहुँच गया और उनसे बातें करने लगा। थोडी देर में वहाँ वह ड्राइवर आ गया जो उन्हें लेकर आया था। वह भी दादाजी के साथ बात करने लगा। उसने दादाजी से पूछा कि क्या उनके रुकने की ठीक व्यवस्था हो गई। वस्तुत: दादाजी खाने आदि में बहुत ही परहेज किया करते थे और अगर घर से बाहर हों तो जहाँ भी हों, यदि विश्वसनीय रूप में उनके अनुसार खाने की व्यवस्था हो जाए तो ठीक अन्यथा अपना खाना खुद बनाते थे। इसी तरह उनके पूजा - तपस्या के कार्यक्रम में कोई बाधा न आए, इसलिए कहीं भी हों एक अलग कमरे में रहा करते थे। ड्राइवर शायद उसी संबंध में पूछ रहा था। दादाजी ने उसे आश्वस्त किया कि उनके रुकने की उचित व्यवस्था हो गई है। वहाँ फिल्मी गीत बज रहे थे। कुछ देर के बाद यह गीत -' झिलमिल सितारों का आँगन होगा' बजने लगा। ड्राइवर बात करना बंद कर यह गीत गुनगुनाने लगा। जब गीत समाप्त हो गया तो उसने दादाजी से कहा- बाबाजी मुझे यह गाना बहुत ही पसंद है। इस पर दादाजी ने भी इस गीत की प्रशंसा की और कहा कि इसके भाव बडे सुंदर हैं तथा उन्हें भी यह गीत पसंद है। खैर मैं अब स्वयं को भाग्यशाली समझता हूँ कि शायद मैं ही घर में एकमात्र हूँ जिसे यह मालूम है कि दादाजी को कोई फिल्मी गीत भी पसंद था। कभी-कभी मैं भी इस गीत को गुनगुना लेता हूँ और जब कोई इस पर टिप्पणी करता है तो मैं कहता हूँ कि यह मेरे दादाजी का मनपसंद गीत है।