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सोमवार, 6 अक्टूबर 2014

स्वच्छता अभियान और कचरा बीनने वाला वर्ग !

          मोदीजी द्वारा गाँधी - जयंती से आरंभ किए गए  स्वच्छता अभियान के संदर्भ में  माननीय प्रधानमंत्रीजी का ध्यान समाज के एक वर्गविशेष की तरफ दिलाना चाहता हूँ जो समाज में हाशिए पर होने के बावजूद इस कार्य में सर्वाधिक योगदान करता है.यह तबका है कूडा-कचरा बीनने वालों का. चार पैसे पाने की आशा में इस वर्ग के लोग  इस कार्य के साथ संलग्न बीमारियों के खतरे की परवाह किए बिना कचरा बीनने के काम में लगे रहते हैं. कई बार इनमें बच्चे होते हैं जिन्हें शायद बाल श्रम नियंत्रण कानून के अनुसार काम नहीं करना चाहिए पर पेट की आग इन्हें काम करने के लिए मजबूर करती है. आज से आठ-नौ   वर्ष पूर्व मैं बरेली में रहा करता था. मेरे घर से कुछ आगे जाकर म्युनिसिपैलिटी की कचरागाडी का एक कैरियर रहा करता था जिसमें लोग कचरा डाला करते थे .बहुत सा कचरा बाहर भी निकल कर पडा रहता था एक परिवार भोर में ही आकर वहाँ कचरा बीनने में लग जाता था. एक बुजुर्ग जो शायद बच्चों का पिता था और साथ में चार-पाँच छोटे बच्चे रहते थे. यह बच्चे उक्त स्थान पर कचरा बीनने के बाद शायद पास-पडोस के दूसरे कचरे के ढेरों की तरफ चले जाते थे.  बच्चे श्याम वर्ण के होने के बावजूद सुंदर थे और उन्हें देखकर मैं सोचता कि शायद यही जरा साफ-सुथरे और किसी विद्यालय में होते तो कितने अच्छे लगते. एक दिन मेरी श्रीमतीजी कुछ कचरा उक्त स्थान पर डालने गईं और   जब उन बच्चों को कचरा छाँटते देखा तो व्यथित हुईं क्योंकि वहाँ बहुत सी ऐसी सामग्री पडी थी जो बच्चों को नहीं छूना चाहिए. इसके बाद मेरी श्रीमतीजी उन बच्चों को बुलाकर कई बार खाने-पीने का सामान दे दिया करती थीं.

          मैं माननीय प्रधानमंत्रीजी से अनुरोध करता हूँ कि स्वच्छता के कार्य में  इस वर्ग के लोगों द्वारा किए जा रहे योगदान को देखते हुए ( भले ही वे ऐसा मजबूरीवश कर रहे हों ) इन्हें बूट तथा दस्ताने आदि प्रदान किए जाएं तथा इन्हें सुरक्षित ढंग से कचरा बीनने का तरीका बताया जाए. साथ ही इनके बच्चों के लिए अनौपचारिक रूप से शिक्षा देने  की व्यवस्था की जाए क्योंकि इनके लिए औपचारिक रूप से विद्यालयों में जाकर शिक्षा ग्रहण करना शायद  पारिवारिक हालातों के कारण संभव न हो. साथ ही कचरे का संग्रहण यदि आरंभिक या घरों के स्तर से ही चार भागों : 1.-सामान्य कचरा , 2.- बायोडिग्रेडेबल 3.- जूठन एवं खाद्य 4.- जोखिम वाले पदार्थ  (Hajarduous  material)_ में अलग-अलग किया जाए तथा ऐसा करने के बारे में लोगों को शिक्षित किया जाए तो यह कचरा बीनने वालों के साथ-साथ गाय एवं एवं अन्य पशुओं के लिए भी अच्छा होगा जो खाद्य सामग्री के साथ तमाम सारा पॉलिथिन खा जाते हैं. इन कार्यों हेतु एन. जी. ओ. संस्थाओं की मदद ली जा सकती है.साथ ही म्युनिसिपैल्टियों को भी इस दिशा में सक्रिय प्रयास करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए.

गुरुवार, 2 अक्टूबर 2014

गाँधीजी,सांप्रदायिकता और स्वच्छता (विमर्श )

रघुवंशमणि (मेरे मित्र)-
          गाँधीजी के विचारों में सबसे महत्वपूर्ण विचार धर्मसमभाव का था। जब तक धर्म के नाम पर घृणा और पूर्वाग्रह बने रहेंगे गाँधीजी के विचार प्रासंगिक बने रहेंगे। जब तक मन साफ नहीं होगा बाहरी सफाई बेकार है। पहले मन साफ होना चाहिए। मन के कलुष पर झाडू मारिए।

अनिल अविश्रांत (रघुवंशमणिजी के मित्र)-
          रघुवंश सर जब धर्म में ही समभाव नहीं है तो उनसे संबन्धित विचारों में कहाँ से होगा. धर्म जिन भौतिक कारकों से प्रेरणा ग्रहण करता है अनिवार्य रूप से उसके पक्ष में झुका रहता है और एक बड़े तबके के शोषण का कारण बनता है.

मेरी प्रतिक्रिया-
          शहरों में दंगों का भयंकरतम रूप मलिन बस्तियों में और उनके आस-पास देखने को मिलता है जबकि सफेदपोश इलाके अपेक्षाकृत सुरक्षित रहते हैं. यह इस तथ्य का संकेतक है कि बाहरी सफाई शायद कहीं मन को भी प्रभावित करती है. जब हम अपने घर में या बाहर कहीं निष्कलंक अथवा नैसर्गिक वातावरण में बैठते हैं तभी मन में अच्छे विचार भी आते हैं. कूडे-कचरे के बीच संभवत: हम सभी अच्छे चिंतन को जन्म नहीं दे सकते. धर्म के नाम पर घृणा और पूर्वाग्रह भी व्यक्ति विशेष के चतुर्दिक प्रदूषित (विचारों का प्रदूषण) वातावरण में पनपते हैं. समग्र स्वच्छता का भाव मन और बाहर दोनों ही जगह की मलिनता के निराकरण में सहायक होगा. सारे सांप्रदायिक लडाई-झगडों के मूल में धर्म का स्थूल स्वरूप और अधिकांश लोगों की समझ का वहीं तक सीमित होना है . इस बारे में अनिल अविश्रांतजी के विचार काफी हद तक सच्चाई के निकट हैं. समग्र स्वच्छता इसके निराकरण में सहायक होगी.

रघुवंशमणि-
       तमाम वातानुकूलित कमरों में बैठे कलुषित मन वाले नेता और राजनीतिक लोग दंगे कराते हैं ।यह एक बहुत बड़ी गलतफहमी है कि दंगे होते हैं । दंगे कलुषित मन वाले राजनीतिक संभ्रांत कुटिल लोगों द्वारा कराए जाते है। इसलिए जब तक विचार और मन साफ नहीं होगा, तब तक ये समस्याएँ बनीं रहेंगी । गरीबों के सिर पर ठीकरा फोड़ना उचित नही^ । उन्हें सफेदपोश लोग ही बरगलाते हैं । साफ- सफ्फाक लोग कितनी कालिमा फैलाते हैं इसका प्रमाण वे तमाम दंगे हैं जिनके सूत्र दिल्ली की राजनीति से जुड़े रहे हैं । यह विडम्बना ही है कि साम्प्रदायिक लोगों के हाथ में ही सफाई की बागडोर है। करते गंगा को खराब देते गंगा की दुहाई! सामान्य जनता को मूर्ख बनाया जाता है और इस्तेमाल किया जाता है। उच्च स्थानो पर बैठे कुटिल लोग जब तक ठीक तरीके से सोच नहीं बदलेगे कुछ नहीं ठीक होने वाला । मीडिया के सामने झाड़ू नाचना दूसरी बात है।

मेरी प्रतिक्रिया-
          दंगे जहाँ कई बार प्रायोजित होते हैं वहीं स्वत:स्फूर्त भी होते है। स्वत:स्फूर्त दंगों के पीछे प्राय: गोवध, धार्मिक जुलूस और उन पर पत्थर फेंका जाना, उसका मंदिर या मस्जिद के बगल से निकलना, मस्जिद के सामने हिन्दू धार्मिक संगीत का बजना अथवा हिन्दू धार्मिक कार्यक्रम के समय अजान का होना, दो अलग-अलग संप्रदायों के जुलूसों का आमने-सामने आ जाना,उन्हें एक खास रास्ते से ले जाने की जिद करना जैसे कारण होते हैं । इन दिनों इनमें एक नया कारण समुदाय विशेष की लड़की को छेड़ा जाना और जुड़ गया है। दंगा प्रायोजित हो अथवा स्वत:स्फूर्त दोनों में ही लोगों की नासमझी एक बहुत बड़े कारक और उत्प्रेरक ( catalyst)  दोनों का काम करती है। इसी का फायदा सांप्रदायिक जहर फैलाने वाले उठाते हैं । मैंने अपनी पहले की टिप्पणी में कहा है कि धर्म के नाम पर घृणा और पूर्वाग्रह भी व्यक्ति विशेष के चतुर्दिक प्रदूषित (विचारों का प्रदूषण) वातावरण में पनपते हैं भले ही ऐसा व्यक्ति वातानुकूलित वातावरण में रह रहा हो तो भी क्या? जिन्हें आप सांप्रदायिक कहते हैं उनका सत्ता में आना भी उनकी असफलता का द्योतक है जो स्वयं को धर्मनिरपेक्ष कहते हैं । उन्हें स्वयं का विश्लेषण करना चाहिए कि ऐसा क्यों हुआ। वे क्यों भारतवासियों की नजर में असफल थे जिसके कारण उन्होंने तथाकथित साम्प्रदायिक लोगों के हाथों में सत्ता सौंप दी । उन्हें स्वयं से यह प्रश्न भी करना चाहिए कि उन्होंने गाँधीजी को क्यों अनाथ छोड दिया था जिससे एक दक्षिणपंथी को गाँधीजी को अपना बनाने का मौका मिल गया । अब यह तथाकथित कम्यूनल लोग लोग पावर में आ गए हैं और पूर्ण बहुमत के साथ अगले पाँच साल तक रहेंगे। तो आने वाले पाँच सालों तक क्या उनके द्वारा उठाए जाने वाले अच्छे कदमों का विरोध भी मात्र इस आधार पर किया जाए कि वे कम्यूनल हैं । क्या सड़क पर,स्टेशन पर और चौराहों पर पड़ा कचरा आपको विचलित नहीं करता? क्या यह कचरा और गंगा में डाला जाने वाला कचरा मात्र कम्यूनल लोगों का योगदान है? क्या इसके लिए सभी भारतीय जिम्मेदार नहीं हैं और क्या सभी भारतीयों को अपने चारों तरफ के वातावरण को साफ रखने की कोशिश नहीं करनी चाहिए? वैसे मुझे व्यक्तिगत तौर पर मोदी के स्वच्छता अभियान की सफलता में संदेह है क्योंकि हम भारतवासी अपनी आदतों विशेषकर गंदी आदतों को बदलेंगे यही संदेहास्पद है, पर एक अच्छा प्रयास सराहनायोग्य है। अगर कोई आसमाँ की तरफ पत्थर उछाल कर सूराख करने की कोशिश भर कर रहा है तो भी उसके हौसले की दाद देनी चाहिए. मेरे पिताजी कहते थे कि यदि अपने मातहतों से काम कराना चाहते हो तो पहले खुद काम करके उनके सामने उदाहरण प्रस्तुत करो । मैंने अपने काम के दौरान इसे सफलतापूर्वक आजमाया है। वही काम मोदी कर रहे हैं, इसमें महज फोटो खिंचवाने जैसी बात नहीं है। सांप्रदायिकता और स्वच्छता दो अलग-अलग मुद्दे हैं जिनका एक दूसरे में घालमेल करने से एक अच्छी बात दब जाएगी । सांप्रदायिकता का विरोध एक अलग मुद्दे के रूप में किया जाना चाहिए। मन के कलुष को साफ करने के लिए अलग दूसरे प्रयासों की जरूरत है। वैसे मन की सफाई करना बाहरी भौतिक सफाई से बहुत अधिक कठिन और श्रमसाध्य है।

सोमवार, 15 सितंबर 2014

प्रकृति का दुर्लभ लौकिक संगीत!-2 (विमर्श )

     


          मैंने और मेरे मित्र संजय त्रिपाठी ने अपने जिन अनुभवों की चर्चा की है( देखिए: प्रकृति का दुर्लभ लौकिक संगीत!-1), उन्हें कोई धार्मिक व्यक्ति ब्रम्हज्ञान या दैवीय से जोड़ सकता है। यह उसके धार्मिक दृष्टिकोण की बात होगी । दूसरे शब्दों में यह निर्वचन interpretation का मामला है । मुझे इस प्रकार के अनुभव अपने मनोजगत से जुड़े लगे । मैं इन्हें किसी भी तरह से धर्म या आस्था से नहीं जोड़ पाता । मेरे अन्य मित्रों ने भी मुझे कुछ ऐसे अनुभव बताये हैं । वास्तव में ये अनुभव मूलतः धार्मिक नहीं होते । उन्हें हमारे दृष्टिकोण या आग्रह ही ऐसे रंग प्रदान करते । इन्हें धार्मिक मान लेने पर इन्हें ब्रम्ह से जोड़ कर अनिर्वचनीय सिद्ध कर दिया जाता है और इस प्रकार इनके विश्लेषण अथवा निर्वचन का सवाल स्थगित हो जाता है। - रघुवंशमणि (मेरे मित्र)
  
                           प्रकृति को जानने का कोई भी प्रयास ब्रह्मज्ञान की ही दिशा में किया गया प्रयास है
          रघुवंशजी !निश्चय ही यह पूरी तरह अपने-अपने interpretation की ही बात है. ऐसे भी लोग हैं जो मेरे घर आने पर कहते हैं कि मैं जंगल में रहता हूँ और दूसरी तरफ आस्था से भरे ऐसे भी लोग हैं जो स्थान विशेष पर पंडों की कहा-सुनी और सौदेबाजी तथा धक्का-मुक्की के बाद देवी प्रतिमा का दर्शन कर लेने के बाद स्वयं को धन्य मानते हैं. उनका मानना है कि स्थान विशेष पर देवी के दर्शनों की महिमा अलग होती है.वस्तुत: उनका interpretation आस्था में सना रहता है तथा इस कारण धार्मिक स्थलों की अव्यवस्था तथा व्यावसायिकता उन्हें धार्मिक व्यवस्था का ही एक भाग लगती है. उन्हें यह उपेक्षणीय लगती है अथवा इसमें उन्हें कोई बुराई नजर नहीं आती. 
          मेरा मानना है कि इस चराचर जगत में जो कुछ भी है वह प्रकृति में मौजूद है चाहे उसे खुदा कहो नेचर कहो या फितरत कहो. जो वैज्ञानिक खोजें भी होती हैं वे भी प्रकृति में पहले से ही मौजूद हैं ,वैज्ञानिक उन्हें interpret करने में सक्षम होकर उनकी खोज का श्रेय पा जाता है. इस प्रकार की खोजों का समायोजन कर जब वह एक सिस्टम को बना लेने में सक्षम हो जाता है तो वही नया आविष्कार कहलाता है . न्यूटन का कहना था कि उसने सारे जीवन में जो ज्ञान अर्जित किया वह समुद्र की एक बूँद के बराबर था. गुलाम अली का कहना है कि संगीत उस महासागर की तरह है जहाँ कहीं भी थाह लेने का प्रयास करने पर सुर का गहरा जल ही जल हाथ आता है,इतना कुछ सीखने के लिए है कि एक जीवन अपर्याप्त है. स्टीव जॉब्स नीम करौली बाबा से भेंट की आस लेकर भारत आए थे. एक दिन उन्हें अहसास हुआ कि मानवता का भला करने वाला एक आविष्कार 1000 नीम करौली बाबाओं से भेंट करने से बेहतर है तथा वे अमेरिका वापस लौट गए. इसके बाद उन्होंने एक गैराज किराए पर लेकर एपल के साम्राज्य की नींव डाली तथा उनके आविष्कारों ने दुनिया को बदल डाला.पर उन्होंने जो कुछ भी किया वह प्रकृति के नियमों और संरचनाओं की खोज ,उनका समायोजन और उन्हें नया स्वरूप प्रदान करना भर था. क्या न्यूटन ,गुलाम अली या स्टीव जॉब्स के प्रयास ब्रह्म को जानने की ही दिशा में किए गए प्रयास नहीं थे? मुझे तो लगता है कि वे सभी जो इस प्रकृति को जानने- समझने की कोशिश में लगे हैं ब्रह्मज्ञान की ही दिशा में ही प्रयास कर रहे हैं और निश्चय ही एक व्यक्ति का जीवन प्रकृति के संपूर्ण रहस्यों को जानने के लिए अपर्याप्त है. हजारों-हजार मानवों के द्वारा खोजें करने के बाद भी हम हिग्स-बोसान की संभावना की पुष्टि तक ही पहुँच पाए हैं और इस ब्र्ह्मांड के अनंत विस्तार में अभी तक पृथ्वी जैसा दूसरा गृह नहीं ढूढ पाए हैं .हम लोग तो उस शिशु की तरह हैं जो प्रकृति को देखकर अभिभूत हो जाता है, उन्हें शब्दाकार देने का प्रयास करता है और कभी-कभी इस प्रयास में कविता सी कर जाता है. 

रविवार, 14 सितंबर 2014

प्रकृति का दुर्लभ लौकिक संगीत!-1 (विमर्श )


      

        " कई साल पहले की बात है मैं अपने एक मित्र से मिलने गया था जिनका घर नदी के किनारे था। उस घर के पास पेडों के सिलसिले थे।वह दृश्य कुछ जंगल जैसा था हालाँकि उसे जंगल कहना ठीक नहीं । मैं अपने मित्र से मिलने के बाद पेड़ों के बीच घूमने निकल गया । मुझे उस वातावरण में अपूर्व शान्ति का अनुभव हुआ । यह अहसास काफी गहरा था और कुछ समय के लिए वहीं बैठ गया । फिर कुछ देर बाद जब मैं उस अनुभूति से बाहर निकला तो मुझे वर्ड्सवर्थ की वह पंक्ति याद आयी जिसमें उन्होंने प्रकृति में मनुष्यता का दर्द भरा संगीत सुना था।
           यह अनुभूति कहीं से भी धार्मिक नहीं थी। मगर वह अहसास आज भी बना हुआ है। मैं इस प्रकार की अनुभूतियों को आध्यात्मिक ही कहूँ गा।"- रघुवंशमणि (मेरे मित्र)

                                               प्रकृति का दुर्लभ संगीत बनाम धर्म का व्यवसाई रूप
          रघुवंशजी! आपने जिस वातावरण की चर्चा की है संयोग से मैं पिछले सात वर्षों से कुछ वैसे ही स्थान पर रहता हूँ. जब मैं शुरू में इस स्थान पर आया तो जैसा आपने कहा वैसा ही कुछ मुझे अनुभव हुआ. मैं इस वातावरण में भ्रमण कर आनंदातिरेक से भर जाता था.गंगा के किनारे बैठना ,जाती हुई लहरों को देखना, वृक्ष आच्छादित सुरम्य वातावरण मन को निस्सीम शांति से भर देते थे. यह मेरा नित्य का क्रम बन गया. यह स्थिति तीन-चार वर्षों तक रही. इस बीच पत्नी ने यहाँ अध्यापनकार्य शुरू कर दिया . आगे चलकर माँ की तबियत भी गडबड रहने लगी जिससे मेरे लिए यह अनिवार्य हो गया कि मैं प्रात: घर में पत्नी की सहायता करूँ ताकि वह समय पर विद्यालय के लिए निकल सकें. इस प्रकार नित्य प्राकृतिक सानिध्य का जो क्रम मैंने बनाया था वह टूट गया. पर कई बार जब प्रात: मैं अपनी खिडकी से बारिश की फुहारें पडता देखता हूँ तो ऐसी स्थिति में मेरा मन पिंजरें में कैद पंछी की तरह फडफडाता है और मैं बाहर निकलने को आतुर हो उठता हूँ. पहाडों पर भी मैंने प्रकृति की सामीप्यता के सुख का अनुभव किया है पर वह सरिता या समुद्रतट के जैसी अनिर्वचनीय नहीं प्रतीत हुई. मैंने इसके विश्लेषण का प्रयास किया और मुझे लगा कि संभवत: इसका कारण पहाड का जड होना है जबकि नदी या सागर सदैव गतिमान दिखाई देते हैं. आवश्यक नहीं है कि दूसरे की अनुभूति भी मेरी तरह हो क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति का अनुभूति का स्तर भी अलग-अलग होता है.मैं इसे प्रकृति में मनुष्यता का दर्द भरा संगीत नहीं बल्कि प्रकृति के दुर्लभ लौकिक संगीत की संज्ञा दूँगा. 

          इसके विपरीत कई धार्मिक स्थलों पर जहाँ पंडे-पुजारी, धार्मिक ग्राहक को लुभाने या उससे पैसा वसूलने की होड सी करते दिखाई देते हैं मेरा मन वितृष्णा से भर जाता है और धर्म का व्यवसाई रूप देख कर मन क्षुब्ध हो जाया करता है. मैं बीस वर्ष पूर्व कोलकाता के कालीघाट मंदिर गया था उसके बाद दोबारा नहीं गया. इस वर्ष एक मित्र के आगमन पर बीस वर्ष बाद पुन:गया और फिर से वही विक्षुब्ध कर देने वाला अनुभव रहा. इसी प्रकार वर्ष 2008 में मैं जगन्नाथपुरी गया था. मेरी एक सहकर्मी ने मुझसे कहा था -"दादा आप एक दिन पुरी का मुख्य मंदिर देखने के बाद अगले दिन एक आटो कर लीजिएगा और वह आपको नगर के सारे मंदिर घुमा देगा!" पर पुरी के मंदिर में पंडों और धर्म का व्यवसाई स्वरूप देखने के बाद अगले दिन किसी मंदिर में जाने के बजाय मैंने अपना दिन समुद्र के किनारे बिताना बेहतर समझा. मैं नहीं समझ पाता कि जहाँ किसी बाजार का सा कोलाहल है वहाँ कैसे कोई कुछ पल के लिए भी ध्यान लगा सकता है या कोई इहलौकिक अनुभव कर सकता है.

शनिवार, 23 अगस्त 2014

उनको तो हर तरफ रकीब दिखाई देते हैं (गजल)


                                                                   गजल

( यह गजल मेरे मित्र विक्रम सिंह जी की सपत्नीक उजबेकिस्तान यात्रा पर आधारित है )

उनको तो हर तरफ रकीब दिखाई  देते हैं
पर हमको वो खुशनसीब दिखाई देते हैं    ॥

रश्क क्यूँ न करे ये दुनिया तुम पे ऐ दोस्त
जब यूँ वो तुम्हारे करीब दिखाई देते हैं  ॥

जब भी जेहन में उठने लगते हैं चंद सवाल
उनके चेहरे ही हमें मुजीब दिखाई देते हैं॥

उजबेकों के बीच राजा-रानी हिंदुस्तानी
कुछ वाकये बेहद अजीब दिखाई देते हैं  ॥ 

जिस वतन में भी मिल जाएं अदबनवाज
वहीं हमें लोग लिए  तहजीब दिखाई देते हैं ॥

नायाबों की महफिल में कहाँ जाएं "संजय"
यूँ भी हम आदमी बेतरतीब दिखाई देते हैं ॥
                                                                 -संजय त्रिपाठी




मंगलवार, 29 जुलाई 2014

हिंदी है पहचान देश की !

- हिंदी है पहचान देश की -

हिंदी है पहचान देश की
हिंदी में हम काम करें॥

राजभाषा अधिनियम की
 धारा 343 का सम्मान करें॥

हिंदी में हम बनें प्रवीण
कार्यालय में अपना नाम करें ॥

पुरस्कार भी हैं मिलते प्रचुर
कुशलता प्रदर्शित कर प्राप्त  करें ॥

अंग्रेजी से सरलतर  हिंदी
बिना भय राजभाषा में काम करें॥

त्रुटियाँ हैं हमें कुछ न कुछ सिखातीं
त्रुटियाँ होने से  नहीं डरें॥

 राजभाषाकर्मियों  से लें सहायता
 और काम में सुधार करें॥

हिंदी है शान देश की
हर दिन हिंदी में ही नई शुरुआत करें॥

हिंदी है पहचान देश की
हिंदी में हम काम करें॥
                              -संजय त्रिपाठी

बुधवार, 23 जुलाई 2014

माहे ताबाँ की जुबाँ ने ले भी लिया क्या नाम हमारा (गजल)

          मेरे प्रिय मित्र विक्रम सिंहजी ने आज एक शेर पोस्ट किया था. उसी से प्रेरित होकर लिखी गई यह गजल प्रस्तुत है -


                         गजल
माहे ताबाँ की जुबाँ ने ले भी लिया क्या नाम हमारा
रकीबों की फेहरिस्त में लिख बैठा वो नाम हमारा॥

दुश्मन समझने लगा है जब वो सारे जमाने को
इसमें कर भी पाएगा क्या अब कोई दोस्त बेचारा॥

माहजबीं की जुल्फों के पेंचोखम में यूँ उलझ गया वो
सालों माँ से पूछा भी नहीं उसने है क्या हाल तुम्हारा॥

अरसा हो गया माँ ने सुनी ही नहीं है बेटे की आवाज
हुई भरपूर बारिश तो बोली वो है कोई पुर्सानेहाल हमारा॥

खेतों -अमराइयों में जाने का अब उठता  है कहाँ सवाल
कई सालों से जा भी नहीं पाया है गाँव वो दोस्त हमारा॥

किसी के दिल की गिरह को सुलझाने में हूँ  यूँ मुब्तला
खूबसूरती हो मुजस्सम"संजय" पर आता नहीं दिल हमारा॥
                                                        -संजय त्रिपाठी