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सोमवार, 25 अप्रैल 2016

~ सद्भावना अभियान की जरूरत~

          सन 2012 में गुजरात के अपने मुख्यमंत्रित्वकाल के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने बिहार में सद्भावना यात्रा आरंभ कर पूरी की थी । इस यात्रा के माध्यम से उन्होंने अल्पसंख्यकों विशेषकर मुस्लिम समुदाय तक संपर्क और पहुँच बनाने की कोशिश की थी। इसमें कितनी सफलता मिली इसे वे बेहतर जानते होंगे। पर मैंने इस विषय पर उनका ब्लाग पढ़ा है जहाँ उन्होंने यात्रा का मकसद पूरा होने और अतिशय संतोष मिलने की बात कही है।

          मुझे लगता है कि इन दिनों जब मोदी सरकार को सहिष्णुता के मुद्दे पर बार- बार कटघरे में खड़ा करने के प्रयास चल  रहे हैं , उन्हें देश की जनता विशेषकर मुस्लिमों की आश्वस्ति के लिए पुन: सद्भावना मिशन आरंभ करने की जरूरत है। बेहतर हो कि वे प्रत्येक वर्ष कुछ समय इस प्रकार के सद्भावना अभियान के लिए रखें ।

           किसी को शत्रु समझने वाले उस पर वार वहीं करते हैं जो उसका कमजोर पक्ष दिखाई देता है। मुस्लिम समाज से दूरी और मुस्लिमों के साथ भाजपा,संघ और उसके आनुषंगिक संगठनों के शिथिल या अनुपस्थित संपर्कसूत्र और कहीं-कहीं विरोधी भाव के कारण असहिष्णुता और सांप्रदायिकता के आरोप अभी आगे भी भाजपा और उसकी सरकार पर लगते रहेंगे। अटलजी ने इस स्थिति को बदलने का प्रयास किया था और उन्हें इस दिशा में आंशिक सफलता भी मिली थी। पर पहले तो गुजरात दंगों और फिर सत्ता जाने के बाद अटलजी के अस्वस्थ हो जाने के कारण यह प्रयास गौण हो गए। उसके बाद से इस दिशा में भाजपा की तरफ से कोई गंभीरता नहीं दिखाई गई हैं।

          भाजपा के कुछ नेता निरन्तर इस प्रकार की बयानबाजी करते रहे हैं जिससे दल की सार्वदेशिक स्वीकार्यता प्रभावित होती रही है और उसे नुकसान होता रहा है। अरुण जेटली ने भी बिहार चुनाव के नतीजे आने के बाद इस बात को स्वीकार किया ।किसी भी राजनैतिक दल के राजनीतिक लाभ तब तक स्थाई नहीं हो सकते जब तक कि उसकी अपील सार्वदेशिक, सार्ववर्गिक न हो। पर भाजपा ने केन्द्र में शासन में आ जाने के बाद इस पक्ष को तवज्जो नहीं दी है।भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को इस तरफ ध्यान देने और आवश्यक उपाय करने की जरूरत है।

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